शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

कॉरपोरेट कल्चर में रंगना चाहते हैं माननीय

सुविधाओं की भरमार फिर भी सांसदों का दिल मांगे मोर
भोपाल। सुविधाभोगी हो चुके देश के माननीय कॉरपोरेट कल्चर में रंगते हुए वह तमाम सुविधाएं चाहते हैं,जो उन्हें सबसे अलग दर्शाए। इसका खुलासा सूचना के अधिकार के तहत आरटीआई कार्यकर्ताओं द्वारा जुटाई गई जानकारियों में सामने आया है। हालांकि भारतीय सांसदों से हमेशा ही खास तरह का व्यवहार किया जाता रहा है, जिसे हम वीआईपी कल्चर के नाम से भी जानते हैं। उन्हें हर जगह विशेष सुविधाएं मिलती रही हैं। हाल ही में सांसदों ने मांग की है कि उनके साथ हवाई अड्डों पर भी विशेष व्यवहार हो। कानून बनाने वाले कुछ लोग निजी एयरलाइन द्वारा उनके साथ किए जाने वाले व्यवहार से नाखुश हैं और चाहते हैं कि वह एयर इंडिया द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करें। लेकिन आम जनता के वोट से जीत कर संसद भवन पहुंचने वाले माननीय उनकी समस्याओं को भूल जाते हैं। अकेले मप्र में सांसदों की लापरवाही ने प्रदेश के विकास को चूना लगाया है। प्रदेश के हिस्से में लोकसभा और राज्यसभा का कुल मिलाकर करीब 954 करोड़ रूपए का हिस्सा बनता है, लेकिन सांसदों की ढील-पोल के चलते रिलीज हो पाया सिर्फ 380 करोड़। यानी सीधे-सीधे छह सौ करोड़ का चूना लग गया।
आरटीआई से भी हो चुका है खुलासा
सूचना के अधिकार के तहत आरटीआई कार्यकर्ताओं द्वारा जुटाई गई जानकारियों से सांसदों को मिलने वाली कई विशेष सुविधाओं का पता चलता है। इसके तहत लोकसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रमुखों द्वारा विवेकाधीन कोटा में की गई नियुक्तियों का भी खुलासा हुआ है। आरटीआई के तहत मिली जानकारी के अनुसार इस तरह की 70 नियुक्तियां की गईं। कई मामलों में सांसद बिजली, पानी और टेलीफोन जैसी सुविधाओं का अधिकतम उपयोग सीमा से ज्यादा इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन उसके लिए उन्होंने कोई भुगतान नहीं किया। बिल का भुगतान नहीं करने पर आम आदमी का कनेक्शन तो काट दिया जाता है लेकिन सांसदों के साथ ऐसा व्यवहार कम ही देखने को मिलता है।
भारतीय सांसदों के वेतन और भत्ते मासिक वेतन 50,000 रुपए दैनिक भत्ता 2,000 रुपए (संसद या समिति की बैठक में शामिल होने के लिए) चुनाव क्षेत्र भत्ता 45,000 रुपए प्रतिमाह कार्यालयीन व्यय 45,000 रुपए प्रतिमाह (इनमें से 30,000 रुपए कर्मचारियों के वेतन के लिए) धुलाई भत्ता (सोफा कवर और परदों के लिए) तीन महीने में एक बार फर्नीचर भत्ता 75,000 रुपए वार्षिक ड्यूरेबल फर्नीचर के लिए और 15,000 रुपए वार्षिक नॉन ड्यूरेबल फर्नीचर के लिए पेंशन और अन्य सुविधाएं मासिक पेंशन 20,000 पेंशन हर अतिरिक्त वर्ष के लिए 1,500 वाहनों के लिए ब्याज मुक्त कर्ज 4,00,000 वाहनों के लिए रोड माइलेज रेट 16 प्रति किमी 1,50,000 मुफ्त टेलीफोन कॉल वार्षिक दिल्ली के लुटियन जोन में रहने के लिए बंगला 4,000 किलो लीटर पानी प्रतिवर्ष 50,000 यूनिट बिजली प्रतिवर्ष किचन और बाथरूम में टाइल्स की मरम्मत का खर्च 34जे क्लास के हवाई टिकट प्रतिवर्ष हवाई अड्डे से घर तक का यात्रा भत्ता (न्यूनतम 320 रुपए) प्रतिवर्ष चार संसद सत्रों के दौरान हवाई यात्रा के आठ टिकट (दिल्ली से या दिल्ली तक) सांसद के पति/पत्नी को भी आठ हवाई टिकट पाने का अधिकार संसद सदस्यों को रेलगाड़ी में वातानुकूलित प्रथम श्रेणी का पास और उनके पति/पत्नी को सांसद के साथ रेल पास पर असीमित यात्रा सांसद के साथ जाने वाले व्यक्ति (पति/पत्नी के अलावा) को यात्रा के लिए वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी का पास
दूसरे देशों के सांसदों के वेतन और भत्ता
ब्रिटिश सांसद वार्षिक वेतन 66,396 पाउंड (68,62,711 रुपए) आवास व्यय (लंदन के लिए) 20,100 पाउंड (20,77,849 रुपए) कार्यालयीन व्यय (लंदन के लिए) 25,350 पाउंड (26,20,321 रुपए)
अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य वार्षिक वेतन 1,74,000 डॉलर (1,09,12,894 रुपए सदस्यों के प्रतिनिधित्व का वार्षिक भत्ता 12,43,560 डॉलर (7,79,83,087 रुपए)
लापरवाह सांसदों ने गंवाएं छह सौ करोड़...
प्रदेश के हिस्से में लोकसभा और राज्यसभा का कुल मिलाकर करीब 954 करोड़ रूपए का हिस्सा बनता है, लेकिन सांसदों की ढील-पोल के चलते रिलीज हो पाया सिर्फ 380 करोड़। यानी सीधे-सीधे छह सौ करोड़ का चूना लग गया। किस्मत मेहरबान थी, तभी दूसरे मदों से करीब 132 करोड़ रूपया और मिल गया, लेकिन यहां भी ढील-पोल जारी रही और कुल मिलाकर मिले 512 करोड़ रूपए में 213 करोड़ बिना खर्च हुए वापस सरकार के खजाने में चले गए। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद अरूण यादव सबसे ज्यादा कंजूस निकले, वह अपने हिस्से के करीब 40 करोड़ रूपए खर्च ही नहीं कर पाए।
फिसड्डियों में अरूण यादव सबसे आगे
इसमें सबसे आगे सांसद अरूण यादव रहे। उन्हें खर्च करने के लिए चार साल में कुल 42.37 करोड़ रूपए मिले। लेकिन वह सिर्फ 2.9 करोड़ रूपए खर्च कर पाए और बाकी के 39.63 करोड़ रूपए लौट गए। यही हाल दूसरे सांसदों का भी रहा। इंदौर सांसद सुमित्रा महाजन करीब 7 करोड़ रूपए खर्च नहीं कर पाईं। वहीं राजेश नंदनी और गणेश सिंह आठ-आठ करोड़ रूपए खर्च नहीं कर पाए। राज्यसभा सांसद कप्तान सिंह सोलंकी और अनिल माधव दवे भी फिसड्डियों में शुमार हैं यह क्रमश: 17 करोड़ और 11 करोड़ रूपया खर्च नहीं कर पाए। जबकि नारायण सिंह केसरी आठ करोड़ और माया सिंह सात करोड़ रूपया खर्च नहीं कर पाई।
प्रदेश में किस सांसद ने कितना खर्च किया
लोकसभा सांसद - बची राशि सुषमा स्वराज - 1.39 प्रेमचंद गुड्डू - 4.36 गोविंदप्रसाद मिश्र - 6.35 कांतिलाल भूरिया - 5.33 सज्जन सिंह वर्मा - 1.41 राजेश नंदिनी सिंह - 8.09 गणेश सिंह - 8.11 भूपेंद्र सिंह - 3.87 देवराज सिंह पटेल - 1.00 नारायण सिंह - 1.82 नरेंद्रसिंह तोमर - 1.00 मीनाक्षी नटराजन - 4.93 बसोरीसिंह मसराम - 1.00 माखनसिंह सोलंकी - 7.52 अरूण यादव - 39.46 जितेंद्र सिंह बुंदेला - 3.44 वीरेंद्र कुमार - 1.00 राकेश सिंह - 6.09 सुमित्रा महाजन - 7.31 उदयप्रताप सिंह - 1.00 यशोधराराजे सिंधिया - 1.00 ज्योतिरादित्य सिंधिया - 2.09 गजेंद्र सिंह - 1.00 शिवराजसिंह लोधी - 2.09 कमलनाथ - 1.00 कैलाश जोशी - 0.00360 अशोक अर्गल - 1.00 ज्योति धुर्वे - 5.87 केडी देशमुख - 7.00
राज्यसभा सांसद - राशि
सत्यव्रत चतुर्वेदी - 0.00 नजमा हेपतुल्ला - 5.93 फग्गनसिंह कुलस्ते - 0.00 थावरचंद गेहलोद - 4.07 मेघराज जैन - 1.00 विजयलक्ष्मी साधौ - 6.56 चंदन मित्रा - 2.93 कप्तानसिंह सोलंकी - 18.17 अनिल माधव दवे - 12.55 रघुनंदन शर्मा - 5.81 प्रभात झा - 0.00 अनुसुइया उइके - 0.80 नारायणसिंह केसरी - 10.49 मायासिंह - 8.58 विक्रम वर्मा - 0.67
कॉरपोरेट जगत की तर्ज पर वेतन का सुझाव
इंसोफिस के संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति का सुझाव है कि नेताओं को कॉरपोरेट जगत की तर्ज पर मोटा वेतन दिया जाए तो भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है। मूर्ति के मुताबिक, हम नेताओं से बेहद कड़े परिश्रम की मांग करते हैं, लेकिन उन्हें उतना वेतन या भत्ते नहीं देते, जिसकी जरूरत उन्हें होती है। इस तरह हम अनजाने में उन्हें गलत तरह से पैसे अर्जित करने की दिशा में धकेल देते हैं। मूर्ति ने यह प्रस्ताव भी दिया कि उनकी कंपनी मैसूर में युवा नेताओं को प्रशिक्षण देने के लिए तैयार है। नेताओं को वहां आधुनिक सॉफ्टवेयर की मदद से अर्थशास्त्र की मूलभूत बातों, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों-व्यापार की जानकारी के अलावा बहुत ही चीजें सिखाई जाएंगी।
माननीयों की नई चाह हाल ही में सांसदों के लिए हवाई अड्डों पर उड़ान में देरी की पूर्व सूचना, चेक-इन में प्राथमिकता, बोर्डिंग, कॉम्प्लीमेंट्री लाउंज, प्रोटोकॉल अधिकारी और सुरक्षा में सुविधा व अतिरिक्त नाश्ते जैसी सुविधाएं चाही गई हैं। यह सुविधाएं एयर इंडिया द्वारा पहले से ही दी जा रही हैं। हालांकि जनभावना का ध्यान रखते हुए और वीआईपी संस्कृति पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के मद्देनजर केंद्र सरकार ने विशेष सुविधा की मांग को अस्वीकार कर दिया है।
विशेष सुविधाओं पर एतराज राजनीतिक तंत्र में सुधार की कोशिश करने वाले समाजसेवियों का कहना है कि सांसदों को उतनी सुविधाएं ही मिलनी चाहिए जितनी कानून बनाने के उनके काम के लिए जरूरी हो। इन लोगों का कहना है कि अतिरिक्त चाय और नाश्ते से सांसदों की कानून बनाने की क्षमता में कोई सुधार नहीं आ सकता। ऐसे में यह सारी सुविधाएं दिया जाना उचित प्रतीत नहीं होता।
वेतन में हो गई थी तीन गुना बढ़ोतरी
2010 में मुद्रास्फीर्ति ऊंचे स्तर पर थी और सरकार उसे कम करने की कवायद कर रही थी। तब भी सांसदों ने अपने वेतन और अन्य सुविधाओं को बढ़ा लिया था। तब वेतन में तीन गुना से भी ज्यादा की बढ़ोतरी करते हुए उसे 16,000 रुपए से 50,000 रुपए कर दिया गया था। चुनाव क्षेत्र के खर्च को भी दोगुना करते हुए 45,000 कर दिया गया था।
इस मामले में भाजपा नेता और राज्यसभा सदस्य अनंत कुमार का कहना है कि जनप्रतिनिधियों को सिर्फ उतनी सुविधाएं मिलनी चाहिए जितनी उनके काम के अनुसार जरूरी हों। हालांकि कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित का कहना है कि हमारे वेतन में 5 वर्ष में एक बार बढ़ोतरी होती है। जबकि निजी क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों का वेतन हर वर्ष बढ़ता है। ऐसे में मुझे समझ नहीं आता कि सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं को लोग विशेष व्यवहार क्यों कहते हैं।
फंड से नए प्रोजेक्ट बन सकते हैं, रिपेयर वर्क नहीं
लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है। सांसद के फड से कौन कौन से काम हो सकते हैं, कहां वे अपना फंड इस्तेमाल कर सकते हैं या कहां नहीं कर सकते। अधिकतर वोटरों की इसकी जानकारी नहीं है। कई बार फंड को लेकर भी लोगों में बड़ा कंफ्यूजन रहता है। फंड को लेकर केंद्र सरकार की ओर से गाइड लाइंस भी जारी की गई हैं। सांसद अपने एरिया में किसी भी एजेंसी से कोई भी नया काम करा सकता है, लेकिन मेनटेनेंस और रिपेयर का काम सांसद के फंड से नहीं किया जा सकता है। केवल नए काम ही सांसद के फंड से कराए जा सकते हैं। सांसद फंड अवैध कॉलोनियों में नहीं लगाया जा सकता।
फंड के लिए गाइड लाइंस
सांसद फंड का इस्तेमाल अपने लोकसभा क्षेत्र में कहीं भी कर सकता है, जबकि राज्य सभा और लोकसभा में मनोनीत सदस्य पूरे देश में कहीं भी काम करा सकते हैं। सांसद को फंड का 15 फीसदी हिस्सा अनुसूचित जातियों के रिहायशी क्षेत्र और 7.5 फीसदी हिस्सा (37.5 लाख) अनुसूचित जनजाति इलाकों में खर्च करना जरूरी है।
5 करोड़ का फंड सांसद भी लोगों के बीच रहता है और उनकी समस्याओं को सुनता है, इसलिए 1993 और 1994 में सांसद फंड की शुरूआत हुई। तब सांसद फंड केवल 5 लाख रुपए था। 1995-96 में यह फंड बढ़ाकर 1 करोड़ कर दिया गया। 1999-98 में 2 करोड़ और 2011-12 से इसे बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया गया। फंड के खर्च, निगरानी व विभागों के बीच तालमेल करने के लिए एक नोडल ऑफिसर की अपॉइंटमेंट की गई है।
पार्क से ब्रिज तक इंटरनैशनल बॉर्डर से 8 किलोमीटर के भीतर के दायरे में किसी भी नदी से सिंचाई व बाढ़ नियंत्रण की स्कीम के लिए भी सांसद फंड का इस्तेमाल किया जा सकता है। रेलवे हॉल्ट, पार्क, बारातघर, रेलवे अंडर ब्रिज, नई सड़क, जैसे काम भी सांसद फंड से कराए जा सकते हैं।
सबके काम का फंड
एमपी फंड के इस्तेमाल के लिए मिनिमम राशि 1 लाख से कम नहीं होनी चाहिए। विकलांग व्यक्तियों की सहायता के लिए एमपी फंड से 10 लाख रुपये तक मिल सकते हैं, लेकिन यह फंड उनके लिए तीन पहियों की साइकल (बैटरी चलित या मैनुअल) या कृत्रिम अंगों के लिए ही खर्च की जा सकती है। स्कूल, कॉलेजों और लाइब्रेरी में किताबें खरीदने के लिए 22 लाख तक की राशि एमपी फंड से इस्तेमाल हो सकती है। सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त एजुकेशन इंस्टिट्यूटों के लिए भी एमपी फंड खर्च किया जा सकता है।
आरटीआई का साथ
सांसद द्वारा तय किया गया कोई भी काम उसकी सहमति के बिना नहीं बदला जाएगा। अगर नोडल ऑफिसर को लगता है कि यह काम नहीं हो सकता तो उसे सांसद, केंद्र सरकार और राज्य सरकार को प्रस्ताव की तारीख के 45 दिन के अंदर यह बात बतानी होगी। अगर तय प्रस्तावों से ज्यादा प्रस्ताव कामों के आ जाते हैं तो पहले आओ पहले पाओ के नियम के तहत काम किए जाएंगे। एमपी फंड के इस्तेमाल की जानकारी आरटीआई के जरिए भी मांगी जा सकती है।
डिजास्टर में हेल्प
अगर प्राकृतिक आपदा आ जाती है जैसे तूफान, बाढ़, बादल फटना, भूकंप, ओला, हिमस्खलन, कीट हमला, भूस्खलन, तूफान, फायर, रेडियालॉजी खतरा होने पर एमपी अपने फंड से हर साल 10 लाख रुपए तक दे सकता है। देश के किसी भी हिस्से में गंभीर आपदा आने पर सांसद फंड से अधिकतम 50 लाख रुपये तक दे सकता है। एमपी फंड को इस्तेमाल करने के लिए ग्रामीण इलाकों में पंचायती राज संस्थाएं, शहर में नगर निगम, नगर पालिका जैसी एजेंसियां काम करती हैं।
कब मिलता है फंड 3 महीने तक सांसद को कोई भी राशि नहीं मिलती है। 9 महीने तक सालाना आवंटन की 50 फीसदी राशि मिलती है। 9 महीने के बाद सालाना आवंटन की 100 फीसदी राशि जारी की जाती है

543 सीटों पर खर्च होगी 70 अरब की ब्लैक मनी!

मप्र की 10 सीटों पर कालाधन तो 11 पर बंदूक के बल पर होगा मतदान
रोजाना जब्त हो रहा है 6 करोड़ का कालाधन
29 दलों से जुड़े 2200 नेताओं के खातों की हो रही पड़ताल
भोपाल। लोकसभा चुनाव में ब्लैक मनी की रोकथाम में लगी फाइनेंसियल इंटेलीजेंस यूनिट ( चुनाव आयोग के निर्देश पर ये फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट-एफआईयू-बनी है) की माने तो इस बार देश की 543 सीटों पर करीब 70 अरब रुपए का कालाधन इस्तेमाल होने वाला है। जहां देश में उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 20 अरब तो मप्र में आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद चुनाव में 240 करोड़ रुपए का कालाधन इस्तेमाल किए जाने की आशंका जताई गई है। एफआईयू के अनुसार,यह सारी रकम केवल प्रचार-प्रसार पर ही खर्च नहीं होगी बल्कि इनका इस्तेमाल प्रोपर्टी खरीदने में भी हो रहा है। उधर,मप्र की 10 सीटों पर जहां कालेधन से तो 11 सीटों पर बाहुबल से मतदान कराए जाने की आशंका व्यक्त की गई है। इसको देखते हुए जांच एजेंसियों से लेकर सुरक्षा एजेंसियों ने देशभर में अपना जाल बिछाया हुआ है और रोजाना करीब 6 करोड़ की ब्लैकमनी जब्त की जा रही है।
पिछले छह महीने के ट्रांजेक्शन का लेखाजोखा तैयार
चुनाव आयोग के निर्देश पर फाइनेंसियल इंटेलीजेंस यूनिट यानि एफआईयू ने नेताओं के पिछले छह महीने के ट्रांजेक्शन का लेखा जोखा निकाल लिया है, जिसका आकलन करने के बाद कालेधन के इस्तेमाल की आशंका जताई गई है। एफआईयू ने पिछले साल सितंबर से फरवरी के दौरान बैंक खातों की लेन देन की सघन जांच की है। सूत्रों के मुताबिक जिन खातों की जांच की गई उनमें से अधिकतर विभिन्न दलों से जुड़े नेताओं के थे। इस जांच में कई हैरान कर देने वाली जानकारी मिली। एफआईयू की जांच में पता चला कि सितंबर 2013 से फरवरी 2014 तक मप्र में बड़ी संख्या में वाहन और संपत्ति की खरीद फरोख्त हुई। आमतौर पर प्रदेश में बैंकों से हर रोज 5 अरब की रकम निकाली जाती है और 4.50 अरब की रकम जमा की जाती है। लेकिन सितंबर 2013 से 28 फरवरी 2014 तक औसतन 7 अरब की रकम निकाली गई और 7.70 अरब रुपए की रकम जमा की गई। वहीं उतर प्रदेश में हर रोज 19 अरब निकाला जाता है और 10.50 अरब की रकम जमा की जाती है। लेकिन इस दौरान 24 अरब की रकम निकाली गई और 23.50 अरब रुपए की रकम जमा की गई। इसके बाद बैंको का कारोबार अचानक स्थिर हो गया। जब जांच हुई तो पता चला कि देश में 84.12 लाख लोगों के एक से अधिक खाते हैं। बैंकों के कारोबार में आए अचानक बदलाव के बारे में एफआईयू ने गहनता से जांच शुरू कर दी। ऐसे खातेदारों के नाम निकाले जाने लगे तो एक और हैरान कर देने वाली जानकारी सामने थी। जांच के दौरान 29 दलों से जुड़े करीब 2200 नेताओं के खातों से किए गए लेन देन संदेह पैदा कर रहे हैं। वजह ये कि इन खास खातों में सितंबर से फरवरी के बीच हुई लेन देन की जानकारी आयकर रिटर्न में नहीं दी गई थी। कई मामलों में तो खातों की ही जानकारी आयकर रिटर्न से गायब थी। एफआईयू के लिए ये चौंकाने वाली जानकारी थी जिसके बाद उसने अपनी रिपोर्ट चुनाव आयोग को दी। आयोग ने इस संबंध में आरबीआई को पत्र लिख कर ऐसे खातों के बारे में जानकारी मांगी है। संदिग्ध लोगों को जल्द ही आयकर का नोटिस भी मिल सकता है।
रोजाना जब्त हो रहा है 6 करोड़
चुनाव आयोग के तलाशी दस्ते हर रोज तकरीबन 6 करोड़ रुपए से ज्यादा का कालाधन जब्त कर रहे हैं। आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद चुनाव में कालाधन इस्तेमाल किए जाने की आशंका जताई गई है। आयोग के आंकड़े के मुताबिक चुनाव की तारीखों का एलान होने के बाद से 25 मार्च तक तकरीबन 120 करोड़ रुपए जब्त किए गए हैं जिनका कोई हिसाब किताब नहीं मिला है। जांच एजेंसियों के मुताबिक शेयर बाजार के जरिए भारी मात्रा में चुनावों मे इस्तेमाल करने के लिए कालाधन भारत आ चुका है। इस साल अब तक भारत में 15,000 करोड़ रुपए तक कालाधन आया है। वहीं चुनाव खत्म होने तक 45,000 से 55,000 करोड़ रुपए तक का कालाधन भारत में आने की आशंका है। विदेशों से आ रहा यह कालाधन एफआईआई के पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिए भारत में लाया गया है।
मप्र में पकड़ाया 15 करोड़ का कालाधन
आचार संहिता लागू होने के बाद से अब तक मप्र में करीब 15 करोड़ रुपए की सामग्री और नकदी बरामद हो चुकी है। जिसमें विदेशी मुद्रा भी है। भोपाल के राजा भोज विमानतल पर तैनात आयकर इंटेलीजेंस यूनिट ने 6 अपै्रल को एयर कार्गो के जरिए आ रही 1 करोड़ 40 लाख रुपए मूल्य की विदेशी मुद्रा पकड़ी है। यह करेंसी इस व्यवसाय से जुड़े एक कारोबारी की बताई गई है जो कि एयर कार्गो के जरिए दिल्ली से भोपाल लाई गई थी। आयकर विभाग ने मामले की पड़ताल शुरू कर दी है मुद्रा कारोबारी का नाम अभी उजागर नहीं किया गया है। इसके अलावा एयर कार्गों से आ रहा 80 तोला सोना भी बरामद किया है। यह सोना बंगलुरु से दिल्ली के रास्ते भोपाल पहुंचाया गया है।
60,000 करोड़ रुपए के नकली नोट
चुनाव में नकली नोटों का इस्तेमाल रोकने के लिए नेशनल इंवेस्टिगेटिव एजेंसी (एनआईए) ने अपनी निगरानी बढ़ा दी है। एनआईए के ताजा आंकड़ों के अनुसार, करीब 60,000 करोड़ रुपए के नकली नोट भारत आ चुके हैं। चुनाव में बड़े पैमाने पर नकली नोट का इस्तेमाल होने की आशंका है। वहीं पकड़े जाने के डर से 500 और 1000 के नकली नोट की आवक कम हो रही है, लेकिन 10, 20 और 50 के नकली नोट बाजार में लाए गए हैं।
चुनाव पर खर्च होंगे 50 हजार करोड़
फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट शोध संस्था सीएमएस के अनुसार चुनाव के दौरान काले धन का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। इस बार के लोकसभा चुनाव भी इससे अलग नहीं दिख रहे। इस बार चुनाव के दौरान होने वाले अनुमानित 50 हजार करोड़ रुपए खर्च की एक तिहाई से अधिक की राशि काला धन हो सकता है। 50 हजार करोड़ रुपए की यह राशि भारत में किसी भी चुनाव में सर्वाधिक है। शोध संस्था सीएमएस के अध्ययन के अनुसार विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों द्वारा लोकसभा चुनाव में 15 से 20 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का अनुमान है। उम्मीदवार निजी रूप से 10 हजार से 15 हजार करोड़ रुपए खर्च कर सकते हैं। इन आंकड़ों में आधिकारिक और बिना लेखा के होने वाला खर्च शामिल है। अगर फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट और सीएमएस के आंकड़ों को मिलाएं तो करीब 69.50 अरब रूपए प्रोपर्टी और अन्य संसाधन खरीदने पर खर्च किए जाएंगे। इनमें से अधिकांश वह रकम होगी,जो विदेशों से भारत लाई जा रही है।
प्रति मतदाता खर्च होंगे 400 रुपए
सीएमएस के अध्यक्ष एन भास्कर राव ने कहा कि चुनाव में खर्च होने वाली राशि में से करीब एक तिहाई काला धन है। इनमें से बड़ी राशि 'नोट के बदले वोटÓ में इस्तेमाल की जा सकती है। लोकसभा चुनाव में इस बार करीब 81.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। 30 हजार करोड़ रुपए की राशि को खर्च करने पर यह प्रति मतदाता 400 रुपए आता है। अध्ययन में कहा गया है कि इसमें मीडिया अभियान का खर्च करीब 25 प्रतिशत है।
सख्ती के बावजूद नहीं कर रहे परहेज
चुनाव आयोग की सख्ती के बावजूद उम्मीदवार लोकसभा चुनाव में कालेधन का इस्तेमाल करने से परहेज नहीं कर रहे हैं। हाल यह है कि चुनाव की घोषणा होने के बाद पहले बीस दिन में ही चुनाव आयोग ने रोजाना छह करोड़ रुपए से अधिक की राशि जब्त की है।
आयकर विभाग ने कसी कमर लोकसभा चुनाव में कालेधन की आवाजाही रोकने आयकर विभाग ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में व्यापक स्तर पर तैयारी की है। दोनों राज्यों के प्रमुख नगरों और सीमावर्ती जिलों में अफसरों की टीम तैनात की गई है। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और रायपुर से हवाला कारोबारियों के अहम सुराग मिले हैं। इनमें इंदौर व रायपुर ज्यादा संवेदनशील माने गए हैं, यहां नकदी का सर्वाधिक फ्लो बताया गया है। बड़े लेन-देन की जानकारियां भी विभिन्न एजेंसियों के जरिए मंगाई जा रही है।
हवाला करोबारी हैं निशाने पर
चुनाव के मद्देनजर आयकर विभाग ने विभिन्न जांच एजेंसियों की मदद से हवाला कारोबारियों को निशाने पर लिया है। हाल ही में अफसरों की टीम ने ग्वालियर और छत्तीसगढ़ में दो-तीन ऐसे मामलों का खुलासा किया है जो हवाला कारोबार से संबद्ध बताए जा रहे हैं। दोनों ही राज्यों की कुल 40 लोकसभा सीटों पर विभाग की टीमें उम्मीदवारों द्वारा किए जा रहे खर्च का ब्यौरा एकत्र करने के साथ ही कालेधन की आवाजाही पर भी नजर रखे हुए है।
जुटाई जा रही जानकारियां
विभाग ने खर्च के लिहाज से ऐसी सीटें भी चिह्नित की हैं जहां पैसा पानी की तरह बहने की संभावना है इसलिए हवाला कारोबारियों के बारे में जानकारियां जुटाई जा रही हैं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि चुनाव के दौरान बड़ी मात्रा में कालाधन यहां से वहां भेजा जाता है। यह पैसा प्राय: हवाला कारोबारी ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते हैं। इसमें पैसे को यहां से वहां नहीं ले जाया जाता बल्कि हवाला कारोबारी अपने संपर्क के जरिए कमीशन लेकर देश के किसी भी कोने में पैसा भेज देते हैं।
मप्र में 240 करोड़ का खेल
मप्र में वैसे तो हर सीट पर ब्लैकमनी लगाई जा रही है,जो करीब 240 करोड़ हो सकती है। लेकिन चुनाव आयोग ने 29 में से 10 सीटों पर कालेधन के सर्वाधिक इस्तेमाल की आशंका जताई है। प्रदेश में इंदौर,गुना,सागर,खजुराहो,सतना,जबलपुर,छिंदवाड़ा,विदिशा,मंदसौर और रतलाम संसदीय सीट पर सर्वाधिक ब्लैकमनी लगाई जाएगी। इसमें इन क्षेत्रों के व्यापारी,उद्योगपति,माफिया नेताओं का सहयोग कर रहे हैं। वहीं 11 सीटों पर बाहुबल से चुनाव प्रभावित किए जाने की खबर है। प्रदेश में बालाघाट के साथ भिंड, मुरैना और ग्वालियर सीटों को चुनाव आयोग ने कानून व्यवस्था के नजरिए से अति संवेदनशील माना है, लेकिन पुलिस प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में 11 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जिन पर बाहुबलियों, नक्सलियों और डकैतों का प्रभाव है। इनमें से अधिकांश सीटें उत्तरप्रदेश की सीमा से लगी हुई हैं, जहां उत्तरप्रदेश से होने वाली घुसपैठ के कारण बाहुबल से चुनाव लडऩे की परंपरा बन गई है।उत्तरप्रदेश और मप्र के सीमावर्ती जिलों में लोगों की आपस में रिश्तेदारियां हैं। ऐसे में चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों की मदद के लिए लोगों की आवाजाही होती है। इस कारण सीधी, सतना, रीवा, टीकमगढ़, भिंड, मुरैना, ग्वालियर, शहडोल में उत्तरप्रदेश के बाहुबल और डकैतों का असर पड़ता है। वहीं मंडला, बालाघाट में नक्सलियों का और इंदौर में स्थानीय बाहुबलियों का प्रभाव दिखाई देता है।
अपर मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांताराव के अनुसार, मप्र के लिए उप्र संवेदनशील तो है। इसी के चलते कलेक्टरों को बॉर्डर सील करने के लिए कहा गया है। साथ ही विशेष चौकसी बरतने के भी निर्देश दिए गए हैं। चुनाव आयोग के लिए उत्तरप्रदेश की सीमा से सटी मप्र की लोकसभा सीटों पर बाहुबलियों से निपटना सिरदर्द बन गया है। इसकी वजह दोनों राज्यों में चुनाव की तारीखें अलग-अलग होना हैं। ऐसे में आशंका बनी हुई है कि यूपी से बाहुबली घुसपैठ कर प्रदेश में चुनाव प्रभावित कर सकते हैं। प्रदेश की 11 संसदीय सीटों पर 10 और 17 अप्रैल को मतदान होना है, वहीं प्रदेश से लगी यूपी की लोकसभा सीटों पर 24 और 30 अप्रैल को चुनाव हैं। इन हालात में प्रदेश के पहले और दूसरे चरण में होने वाले मतदान में बाहुबलियों की घुसपैठ की आशंका बनी हुई है। वहीं मंदसौर लोकसभा सीट पर धन-बल के उपयोग की आशंका है।
20 कंपनियां करेंगी नक्सलियों से सुरक्षा
लोकसभा चुनाव से पूर्व जिले में 20 सशस्त्र सुरक्षा कंपनी ने नक्सल प्रभावित क्षेत्र के जंगलों में सर्चिंग शुरू कर दी है। सीआरपीएफ, हार्क फोर्स, बीएसएफ, सीआईएसएफ सहित अन्य सुरक्षा कंपनी जंगल के चप्पे-चप्पे की खाक छानने में लगेंगी। बालाघाट के एसपी गौरव तिवारी के अनुसार वर्तमान समय में भी सर्चिंग आपरेशन चलाए जा रहा है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में यह रूटीन वर्क की तरह होता है।
छग-महाराष्ट्र की सीमा सील
लोकसभा चुनाव की तैयारी के तहत पड़ोसी राज्य छत्तीगसढ़ और महाराष्ट्र की सीमा को सील कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ की सीमा जिले के लंाजी, बैहर, बिरसा तहसील से लगी हुई है। पूर्व से ही मध्य प्रदेश को शरर्णीथली मनाने वाले नक्सली छग में चले सर्चिंग अभियान के दौरान नक्सलियों की भारी खेप जिले के सीमा के भीतर प्रवेश कर सकती है। ऐसे में चुनाव की तारीख नजदीक आने से पूर्व आपरेशन सर्चिग चलाए जाना शांति पूर्ण चुनाव करवाने की दुष्टि से बहुत अधिक महत्पूर्ण माना जा रहा है। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र में नक्सली गतिविधि और बालाघाट के सीमावर्ती होने और भौगोलिक स्थिति को देखते हुए एसपी गौरव तिवारी ने पहले ही 50 कम्पनी (5 हजार जवान) और 2 हैलीकाप्टर की मांग चुनाव आयोग से की थी। इसी के तहत अब तक 20 कपंनी उपलब्ध हो चुकी हंै। चुनाव से 20 दिन पहले सुरक्षा की दृष्टि से इसे बेहतर माना जा रहा है।
नक्सलियों से बूथ केप्चरिंग का खतरा
लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान नक्सली समूह सीमावर्ती इलाकों के मतदान केंद्रों पर बूथ कैप्चरिंग जैसी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं। इसके लिए नए समूह बनाए जा रहे हैं जबकि बड़ी मात्रा में असलहा भी जुटाया जा चुका है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ये सूचना मध्यप्रदेश शासन पुलिस मुख्यालय को भेजते हुए एहतियात बरतने के निर्देश दिए हैं।केंद्रीय खुफिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा राज्य सरकारों से कहा गया है कि आम चुनाव के दौरान प्रभावित इलाकों में कई चरणों में सुरक्षा पुख्ता की जाए। केंद्रीय जांच एजेंसियों ने अंदेशा जताया है कि चुनाव के दौरान गड़बड़ी करने के लिए नक्सलियों ने बड़ी संख्या में असलहा जुटाया है और सघन जंगली इलाकों में ट्रेनिंग केंप चलाए जा रहे हैं। नक्सलियों का ऐसा ही एक केंप बालाघाट पुलिस ने हाल ही में ध्वस्त किया था। इस दौरान पुलिस ने बड़ी मात्रा में नक्सलियों का असलहा और बारूदी सुरंग बिछाने का सामान बरामद किया था।
रीवा,सतना और चंबल में सक्रिस हुए डकैत
मप्र के दस्यु प्रभावित क्षेत्रों के जंगलों में डकैतों की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। सुगबुगाहट का अंदाजा रीवा,सतना और चंबल क्षेत्र में डकैतों द्वारा कुछ दिनों से की जा रही घटनाओं से लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश से लगी सीमा मानिकपुर व मझगवां के बीच रह-रहकर बलखडिय़ा गिरोह की मूवमेंट न केवल देखने को मिल रही है बल्कि उनके द्वारा दहशत फैलाने की नीयत से विगत एक महीने के अंदर तीन से अधिक वारदात को अंजाम भी दिया जा चुका है। चुनाव में जहां वैलेट को सजातीय नेताओं के पक्ष में लाने के लिए बुलेट का इस्तेमाल गिरोह द्वारा किया जा सकता है। पुलिस एम्बुस लगाकर जंगल सर्चिंग करने की बात करती है। सर्चिंग सिवाय सड़कों के अलाव कहीं भी होती नहीं दिखाई देती है। तराई अंचल के 29 फीसदी मतों बुलट का साया पड़ता है। स्वदेश सिंह बलखडिय़ा पर उत्तर प्रदेश सरकार ने 5 लाख एवं मप्र सरकार ने 1 लाख का दांव लगाया है। कहने के लिए तो उत्तर प्रदेश की एसटीएफ टीम उक्त डकैत के इनकाउण्टर के लिए मोर्चा सम्हाल रखी है।
उधर,रीवा रेंज के आईजी पवन श्रीवास्तव कहते हैं कि डकैत चुनाव को प्रभावित न करें इसके लिए दिशा-निर्देश दिए जा चुके हैं। सर्चिंग जारी है और लगातार तराई अंचल पर नजर बनी हुई है। मुखबिरों को और टटस करने का काम किया जा रहा है। अगर सटीक सूचना हाथ लगी तो इनकाउंटर से भी इंकार नहीं किया जा सकता। उधर,सदियों तक डकैतों के गढ़ रहे चंबल के बीहड़ों में चुनाव भी बस एक मौसम की मानिंद है। भिंड-मुरैना के बदनाम बीहड़ों में एक बार फिर डकैत सक्रिय हो गए हैं। हालांकि इन इलाकों में प्रशासन ऐसा मानता है डकैतों का वजूद अब नहीं है,लेकिन चंबल में बंदूकें अब भी गूंजती है। चुनाव आते ही छोटे-छोटे गिरोह सक्रिय हो जाते हैं और अपने सरपरस्त नेता को जिताने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। इन तमाम विषम परिस्थियों के बीच चुनाव आयोग निष्पक्ष और विवादरहित चुनाव संपन्न कराने के लिए रात-दिन तैयारी कर रहा है।

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

9 सीटों पर भाजपा-कांग्रेस का गणित बिगाड़ेंगे वो

बसपा,सपा और आप के प्रत्याशियों ने रोचक बनाया मुकाबला
भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में तीसरे मोर्चे की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। पिछले 20 सालों में कोई भी ग़ैर कांग्रेस-ग़ैर भाजपा समूह मिलकर भी कभी भी प्रभावी जीत दर्ज नहीं कर सका है। हालांकि प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों पर नजऱ डालने पर यही लगता है कि बुंदेलखंड, ग्वालियर संभाग और विंध्य प्रदेश की कुछ सीटों पर सपा-बसपा के उम्मीदवार मुकाबले को रोचक बनाते रहे हैं। 16वीं लोकसभा के इस समर में मप्र की 29 लोकसभा सीटों में से 9 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस और भाजपा उम्मीदवारों के सामने खड़ा तीसरा चेहरा खासा दमदार है। इन सीटों में से कुछ पर तीसरा उम्मीदवार तो इतना दमदार है कि वह भाजपा-कांग्रेस की लड़ाई का गणित बिगाड़ सकता है।
मुरैना संसदीय क्षेत्र.......
मुरैना में भाजपा ने पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा तो कांग्रेस ने अपने दबंग विधायक गोविंद सिंह को मैदान में उतारा है, लेकिन इन दोनों का गणित बसपा के वृंदावन सिंह सिकरवार बिगाड़ेंगे। यहां पर लहर काम नहीं आती है। इस सीट पर चुनाव जातिगत आधार पर होता है। ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, पिछड़ी व अनुसूचित जाति बहुल्य वाले इस क्षेत्र में मतदाता प्रत्याशी के समाज के आधार पर वोट डालते हैं, न कि पार्टी के आधार पर। कांग्रेस के लिए बड़ी आफत वृंदावन सिकरवार ने खड़ी कर दी है। वे पहले कांग्रेस में थे और कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. गोविंद सिंह के समकक्ष थे। भाजपा के तेज-तर्रार नेता अनूप मिश्रा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे हैं। वे पिछला विधानसभा चुनाव भितरवार से हार गए हैं। पार्टी ने अनूप मिश्रा को मुरैना से प्रत्याशी बनाकर एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक ओर मिश्रा की उम्मीदवारी से मुरैना में भाजपा की गुटबाजी का असर चुनाव पर नहीं पड़ेगा। दूसरी ओर अनूप के पास समर्थकों की बड़ी फौज के साथ-साथ चुनाव में खर्च करने की क्षमता भी अधिक है। मुरैना में ठाकुर मतदाताओं की संख्या अधिक है, इसलिए डॉ. गोविंद सिंह अपना पलड़ा भारी मान रहे हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी और भाजपा की लहर के सामने जातिगत समीकरण कितने चलेंगे, कहना मुश्किल है। डॉ.गोविंद सिंह मुरैना सीट पर वृंदावन सिकरवार को ही अपनी ताकत मानते थे। वृंदावन सिंह सिकरवार के बसपा के जाने से उनके समीकरण गड़बड़ा गए हैं। वहीं भाजपा उम्मीदवार अनूप मिश्रा भी ब्राह्मण वोट व नरेन्द्र सिंह के वोट बैंक के सहारे मुरैना में आए हैं। लेकिन चुनाव के जातिगत आधार पर होने से मुरैना में मुकाबला त्रिकोणीय और रोमांचक हो गया है। कांग्रेस ने डॉ. गोविंद सिंह को ठाकुर वोट बैंक के सहारे मुरैना संसदीय क्षेत्र में उतारा है। लेकिन बसपा ने मुरैना लोकसभा में ठाकुर प्रत्याशी वृंदावन सिंह सिकरवार को ही उतार दिया। वृंदावन सिंह ठाकुर वोट बैंक को बांटेंगे। वृंदावन सिंह न केवल ठाकुर वोट बैंक को बांटेगे, बल्कि बसपा के परंपरागत दलित वोट भी उन्हें मिलेगा। साथ ही पिछड़े वर्ग का मतदाता बंटा हुआ है। इस वजह से भी कांग्रेस प्रत्याशी के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं।
भाजपा के लिए परेशानियां कम नहीं
भाजपा प्रत्याशी ब्राह्मण वोटों, भाजपा के परंपरागत वोट व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष नरेन्द्र सिंह के व्यक्तिगत वोट बैंक के सहारे मुरैना आए हैं। लेकिन भाजपा प्रत्याशी भी बाहरी हैं। भाजपा विधानसभा चुनाव से पहले तक अंबाह व दिमनी (तवंरघार) सुमावली व जौरा क्षेत्र में सबसे अधिक मजबूत थी। यहां पर ठाकुर (तोमर व सिकरवार) मतदाता भाजपा को वोट देते आए थे। लेकिन बदले हुए समीकरणों में ये वोट भाजपा में न जाकर बसपा प्रत्याशी के खाते में जा सकते हैं। इन्हीं क्षेत्रों में नरेन्द्र सिंह का भी प्रभाव था। यदि इन चारों विधानसभाओं के ठाकुर मतदाता मूव करते हैं तो भाजपा के लिए मुश्किल बढ़ जाएंगी।
भिंड संसदीय क्षेत्र.......
भिंड में भाजपा के भागीरथ प्रसाद कांग्रेस की इमरती देवी और बसपा के मनीष कतरोलिया के बीच मुकाबला है। भिंड में कांग्रेस के घोषित प्रत्याशी भागीरथ प्रसाद के अचानक भाजपा में जाने के बाद समीकरण एकदम बदल गए हैं। अशोक अर्गल का टिकट काटकर भागीरथ को टिकट दिए जाने से भाजपा खेमें में नाराजगी है। अर्गल से वैसे भी सब नाराज चल रहे हैं। शुरू में तो यह कहा जा रहा था कि 'कार्यकर्ता न करेंगे काम तो क्या कर लेंगे अर्गलÓ। इस संसदीय क्षेत्र से भाजपा नेताओं, मंत्रियों, व्यापारियों तथा मतदाताओं को अर्गल ने निराश ही किया हैें। कांग्रेस के लिए यह स्थिति बेहद लाभकारी हो सकती थी लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक के चलते उसकी स्थिति काफी कमजोर बनी हुई हैं जिसके चलते कांग्रेस लोकसभा चुनाव के लिये इस संसदीय सीट से अपने उम्मीदवार का नाम इमरती देवी तय कर पाने में काफ ी समय तक असमंजस की स्थिति बनी रही। मजे की बात हंै कि इस संसदीय क्षेत्र से पार्टी के उम्मीदवार तय करने में कांग्रेसी नेताओं के मतभेद सतह पर आ गए हैं जो अभी तक ढके-छिपे हुए थे। इस सीट पर अब नेता प्रतिपक्ष सत्यदेव कटारे की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। पार्टी नेतृत्व ने कटारे को भिंड में जिताऊ उम्मीदवार का नाम देने की जिम्मेदारी सौंपी है। बताया जाता है कि कटारे ने पूर्व गृह मंत्री महेन्द्र बौद्ध का नाम आगे बढ़ाया है। भिंड में कांग्रेस की जीत-हार से कटारे का भविष्य जुड़ा माना जा रहा है।उधर सपा ने बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे स्व पीपी चौधरी की पुत्र वधु अनीता चौधरी को अपना प्रत्याशी बनाया हैं। अनीता के पति हितेन्द्र की कुछ साल पहले जौरा में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। पति और सुसर की हत्या के पश्चात अनीता डेढ़ साल तक राजनीति से दूर रही मगर अब सक्रिय राजनीति में कूद पड़ी हैं। महिला मतदाता को अपनी और आकर्षित करने के मकसद से कांग्रेस ने ड़बरा विधायक इमरती देवी को इस संसदीय क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाया हैं। गिर इस बार कांग्रेस, सपा, आप ने अपना उम्मीदवार महिला को बनाया हैं।
ग्वालियर में तोमर की प्रतिष्ठा दांव पर...
वहीं ग्वालियर में भाजपा के नरेंद्र सिंह तोमर और कांग्रेस के अशोक सिंह के लिए खतरे की घंटी हैं बसपा के आलोक शर्मा। नरेंद्र सिंह तोमर के ऊपर पूरे प्रदेश में प्रचार करने की जिम्मेदारी है। यही कारण है कि तोमर ने मुरैना के बजाए अपने गृह नगर ग्वालियर लोकसभा से लडऩे का निर्णय लिया है। ग्वालियर को तोमर के लिए सबसे सेफ सीट माना जा रहा है। कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार अशोक सिंह को उम्मीदवार बनाया है। अशोक सिंह दो बार यशोधरा राजे सिंधिया से चुनाव हार चुक हैं। ग्वालियर के धनाढ्य व व्यवसायी परिवार से जुड़े अशोक सिंह के लिए यह चुनाव अभी नहीं तो कभी नहीं वाला है। क्योंकि यदि वे लगातार तीसरी बार चुनाव हारे तो उनका राजनीतिक कैरियर समाप्त होने का खतरा है। यही कारण है कि अशोक सिंह इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा के लिए यह चुनाव नरेन्द्र सिंह तोमर का नहीं, प्रदेश अध्यक्ष की प्रतिष्ठा का चुनाव है। यही कारण है कि भाजपा भी पूरी ताकत से चुनाव में उतर रही है। उधर बसपा उम्मीदवार आलोक शर्मा की ताकत को सिर्फ एक बिरादरी विशेष का वोट काटने तक ही सीमित समझा जा रहा है, पर वे स्वयं इस बात को माननेे के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि- 'मैं जीतने के लिये ही ग्वालियर संसदीय क्षेत्र से खड़ा हुआ हूं।Ó लेकिन उनकी पार्टी का चुनावी रिकार्ड उन्हें वोट काटने वाली ताकत से अधिक नहीं बताता। जहां तक कार्यकर्ताओं का सवाल है तो उनकी पहुंच हरिजन एवं ब्राम्हण वर्ग तक ही सीमित है। इन दो वर्गों की ताकत के बूते चुनाव तो लड़ा जा सकता है लेकिन दो वर्गों की ताकत ही चुनाव में विजय दिलाने के लिए काफी नहीं हैं। लेकिन यह निश्चित है कि बसपा प्रत्याशी का चुनाव लडऩा कांग्रेस के लिए परेशानी का कारण है क्योंकि बसपा हरिजनों के जिन मतों को खीचेंगे, वह कांग्रेस के परम्परागत मत समझे जाते हैं। राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए फिलहाल यह बता पाना मुश्किल है कि ग्वालियर में किसकी झोली भरेगी और कौन हाथ मलेगा?
बालाघाट संसदीय सीट...
बालाघाट सीट पर भाजपा के बोधसिंह भगत और कांग्रेस की हीना कांवरे के लिए सपा के अनुभा मुंजारे विलेन बनी हुए हैं। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे इस लोकसभा क्षेत्र में आदिवासी वोटों के अलावा लोधी और पवार जाति के वोट ही निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। भाजपा ने यहां से बोधासिंह भगत को प्रत्याशी बनाया है जो पवार जाति से हैं। पवार जाति से ही कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन भी हैं जो इस फैसले से पूरी तरह खुश नहीं हैं। उनके समर्थक भी नाराज हैं। जिसका खामियाजा भगत को उठाना पड़ेगा। दूसरी तरफ भाजपा से लोधी वर्ग के लोग नाराज हैं। इस वर्ग के प्रहलाद पटेल पहले यहां से सांसद भी रह चुके हैं। कांग्रेस ने यहां युवा और राहुल गांधी की टीम की सदस्य स्वर्गीय लिखीराम कांवरे की की बेटी हीना कांवरे को मैदान में उतारा है। इनका सिवनी व बरघाट नया कार्यक्षेत्र होने के कारण ज्यादा प्रभाव नहीं। जातिगत समीकरण के चलते वोटों का ध्रुवीकरण होना इनके लिए हानिकारक होगा। इन युवा व प्रौढ़ प्रतिद्वंद्वियों को सपा की अनुभा मुंजारे भी चिर-परिचित अंदाज में चुनौती दे रही हैं। जिससे ओबीसी वोटों के ध्रुवीकरण होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। ये वही अनुभा हैं जिन्होंने हालिया विधानसभा चुनाव में मंत्री गौरीशंकर बिसेन की जीत कठिन बना दी थी। इनके अलावा इस सीट के मिजाज के मुताबिक राष्ट्रीय व प्रादेशिक व क्षेत्रीय दलों सहित निर्दलीय रूप में दर्जन भर से अधिक प्रत्याशी चुनाव में खड़े हैं। और लगभग सभी की उम्मीदवारी के पीछे उनका अपना जातिगत समीकरण है। विधानसभा चुनाव में बालाघाट संसदीय सीट में आने वाले आठ विधानसभा क्षेत्रों में से भाजपा को बालाघाट, वारासिवनी, कटंगी व बरघाट में जीत मिली, जबकि कांग्रेस ने बैहर, परसवाड़ा व लांजी सीट पर कब्जा किया था। सिवनी में निर्दलीय को जीत मिली। आजादी के बाद से हुए 10 लोकसभा चुनावों में लगातार भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा। 1998 में गौरीशंकर बिसेन ने कांग्रेस सांसद विश्वेश्वर भगत को हराकर पहली बार भाजपा की जीत का खाता खोला। इसके बाद से यहां भाजपा ही जीतती आ रही है। यहां आप प्रत्याशी को भी अपनों से ही डर है। दरअसल, शुरुआत से जो लोग आम आदमी पार्टी का झंडा लिए और टोपी पहने घूमते थे, टिकट वितरण के बाद पार्टी प्रत्याशी उत्तमकांत चौधरी का सड़क पर विरोध जताकर उन्होंने खुद को अलग कर लिया है।
मंदसौर में भाजपा संकट में...
मंदसौर सीट पर कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन और भाजपा के सुधीर गुप्ता का चुनावी गणित आप के पारस सकलेचा बिगाड़ेंगे। लंबे समय ये भाजपा का गढ़ रही इस सीट से पार्टी ने सुधीर गुप्ता को अपना प्रत्याशी बनाया है। ब्राह्मण मतदाताओं के बाहुल्य वाली इस सीट से लक्ष्मीनारायण पाण्डे कई बार सांसद रहे हैं। पर इस बार रघुनंदन शर्मा को प्रत्याशी बनाए जाने की अटकलें लगाई जा रहीं थीं। अचानक गुप्ता को टिकट दिए जाने के पीछे भी पार्टी के नेता जातिगत समीकरण बता रहे हैं। सूत्रों की मानें तो वैश्य समाज को एडजस्ट करने के लिए मंदसौर का टिकट अनजान नेता गुप्ता को दिया गया। गुप्ता का नाम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से लाया गया था। पार्टी नेताओं की मानें तो वे इस सीट से जीत के प्रति भी पूरी तरह आश्वस्त हैं। उनका मानना है कि इस समय मोदी की आंधी और प्रदेश में शिवराज फैक्टर के कारण मंदसौर सीट जीतने में कोई परेशानी नहीं आएगी। इधर मंदसौर सीट के दूसरे दावेदार बंशीलाल गुर्जर को टिकट नहीं दिए ताने से वे भी नाराज हैं। प्रदेश की कई सीटों में गुर्जर मतदाताओं की संख्या बहुत ज्यादा है पर भाजपा के नेता नहीं है। यहां से जब रघुनंदन शर्मा के भाजपा के टिकट पर मैदान में आने की खबर थी तब तक तो कांग्रेस को कुछ सूझ नहीं रहा था। अब सुधीर गुप्ता की उम्मीदवारी से कांग्रेस में राहत है। यहां का चुनाव अब मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान, पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्रसिंह तोमर और प्रदेश कोषाध्यक्ष चैतन्य काश्यप के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। उधर,कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ एंटीइंकंवेंसी है। लेकिन भाजपा का कमजोर प्रत्याशी उनके लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन उनका सारा खेल आम आदमी पार्टी के पारस सकलेचा बिगाड़ सकते हैं। सकलेचा जमीनी नेता हैं और क्षेत्र में उनकी अच्छी पकड़ है। ये भाजपा और कांग्रेस दोनों के वोट पर चोट कर सकते हैं।
अरुण यादव की अध्यक्षी दांव पर
खंडवा में भाजपा के नंदकुमार सिंह चौहान और कांग्रेस के अरुण यादव के लिए आप के आलोक अग्रवाल खतरा बने हुए हैं। यहां से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव का रास्ता रोकने के लिए भाजपा ने अभी से आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस यहां संगठन पर कम और यादव की निजी टीम के भरोसे ज्यादा है। यहां भाजपा के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने जैसा तेवर दिखाया है उससे स्पष्ट है कि पार्टी अब किसी तरह की ढील देने के पक्ष में नहीं है। भाजपा यहां बूथ स्तर तक की जिम्मेदारी तय कर चुकी है। कहां, कब और क्या संसाधन लगेंगे, इसका आकलन हो गया है। जातिगत समीकरणों का भी पार्टी पूरा फायदा लेना चाहती है और इन जातियों पर प्रभाव रखने वाले पार्टी नेताओं को अभी से मोर्चे पर लगाया गया है। चूंकि यहां भाजपा के बड़े नेताओं में आपसी विवाद बहुत है, इसलिए पार्टी ने वजनदार नेताओं को साधने का काम विजयवर्गीय को सौंपा है। पिछला चुनाव भाजपा भारी गुटबाजी के चलते हारी थी। इन सब के बीच आम आदमी पार्टी के आलोक अग्रवाल दोनों दलों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। क्षेत्र में नर्मदा बचाओ आंदोलन और जागृत दलित आदिवासी संगठन की अपनी-अपनी जमीन और विचारधारा है। इनसे जुड़े लोगों की संख्या भी खासी है। ऐसे में लोकसभा चुनाव में आंदोलन और संगठन का गठबंधन निमाड़ में नया राजनीतिक समीकरण माना जा रहा है। क्षेत्र में नर्मदा बचाओ आंदोलन जहां डूब, पुनर्वास, विस्थापन आदि को लेकर लंबे समय से अपनी पैठ बनाए हुए है। वहीं जागृत आदिवासी दलित संगठन मनरेगा, मातृ एवं शिशु सुरक्षा व स्वास्थ्य, सार्वजनिक वितरण प्रणाली आदि जैसे मुद्दों को लेकर काम कर रहा है। इन जनहितैषी मुद्दों के चलते इनका सीधा संपर्क अंतिम व्यक्ति तक है। दोनों ही जनआंदोलनों का नेतृत्व महिला शक्ति के हाथों में है। आंदोलन का जिम्मा मेधा पाटकर के पास है, तो संगठन की बागडोर माधुरी बहन ने संभाल रखी है।
सतना सीट पर दो सिंहों को ब्राह्मïण की चुनौती...
सतना सीट पर भाजपा प्रत्याशी गणेश सिंह और कांग्रेस प्रत्याशी अजय सिंह राहुल के बीच मुख्य मुकाबला माना जा रहा है, लेकिन बसपा ने ब्राह्मïण जाति के धर्मेंद्र तिवारी को मैदान में उतारकर मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ही असंतोष नजर आ रहा है। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अजय सिंह राहुल का विरोध करते हुए पार्टी से मुंह फेर लिया। प्रत्याशी की घोषणा के बाद युवक कांग्रेस लोकसभा अध्यक्ष सुभाष शर्मा डोली व युवक कांग्रेस शहर अध्यक्ष विजय तिवारी ने पार्टी छोड़ दी। वहीं पूर्व में सईद अहमद की दावेदारी प्रबल मानी जा रही थी, लेकिन अजय सिंह को टिकट मिलते ही इनकी भूमिका क्षेत्र में नजर नहीं आई, अभी तक इन्हें अजय सिंह के समर्थन में क्षेत्र में प्रचार करते नहीं देखा गया। वहीं भाजपा के गणेश सिंह के प्रति रामपुर बाघेलान से भाजपा विधायक हर्षप्रताप सिंह का विरोध जगजाहिर है। महापौर पुष्कर सिंह की भी भूमिका कुछ हद तक संदेहास्पद नजर आ रही है। पिछले दिनों क्षेत्र में आए सीएम शिवराज सिंह ने हर्षप्रताप सिंह व पुष्कर सिंह को बुलाकर पार्टी के पक्ष में काम करने की हिदायत दी थी। यहां बसपा ने ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या को ध्यान में रखकर धर्मेन्द्र तिवारी को मैदान में उतारा है। माना जाता है कि ब्राह्मण वोट यहां निर्णायक की भूमिका अदा करते हैं और वे दोनों की राष्ट्रीय दलों से नाराज चल रहे हैं। सपा ने यहां से नया चेहरा रामपाल यादव को मैदान में उतारा है इसलिए उसका दखल ज्यादा नहीं माना जा रहा है। नागौद निवासी पूर्व मंत्री नागेंद्र सिंह के खजुराहो से लडऩे का असर भी यहां के चुनाव पर दिख सकता है। उनके साथ यहां के भाजपा कार्यकर्ता भी खजुराहो इलाके में काम करेंगे।
रीवा में क्या बसपा बचा पाएगी सीट...?
रीवा में बसपा प्रत्याशी निवर्तमान सांसद देवराज पटेल, कांग्रेस प्रत्याशी सुंदरलाल तिवारी और भाजपा प्रत्याशी जनार्दन मिश्रा के बीच त्रिकोणीय मुकाबले के हालात बन रहे हैं। इस सीट पर भी ब्राह्मण मतदाताओं को निर्णायक बताया जाता है, लेकिन ये वोट कांग्रेस और भाजपा में विभाजित हो सकते हैं। हालांकि पिछले चुनाव में कांग्रेस के सुंदरलाल तिवारी ने देवराज पटेल को टक्कर दी थी। भाजपा के पक्ष में यह है कि विधानसभा चुनाव में उसका वोट प्रतिशत बढ़ा है। इस सीट पर सपा ने भैयालाल कोल को प्रत्याशी बनाया है, लेकिन उनका दखल ज्यादा नहीं दिखता। हालांकि वे भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता रह चुके हैं। यहां भी कांग्रेस प्रत्याशी सुंदरलाल तिवारी और भाजपा प्रत्याशी जनार्दन मिश्रा के सामने पहली चुनौती अपनों से ही निपटने की है। कांग्रेस खेमे में अंतर्कलह सतह पर तो नहीं आया, लेकिन विंध्य के प्रमुख दो घरानों में से एक अमहिया घराने से प्रत्याशी होने को लेकर अंदर ही अंदर कार्यकर्ताओं में भी असंतोष की भावना है। लगातार दो लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी तीसरी बार उन्हें टिकट मिला है, इसका भी गुस्सा कार्यकर्ताओं में है। कांग्रेस में सुन्दरलाल को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद पूर्व कांग्रेसी नेता एवं रीवा महाराज पुष्पराज सिंह ने तो पार्टी ही छोड़ दी। भाजपा में अंतर्कलह इससे भी ज्यादा है। सेमरिया के पूर्व विधायक अभय मिश्रा नाराज चल ही रहे हैं। वहीं गुढ़ विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक नागेन्द्र सिंह हर हाल में उप चुनाव चाह रहे हैं। वहीं मौजूदा विधायक पर जातीय समीकरण को लेकर कांग्रेस के साथ जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं। जातीय समीकरण भी दोनों दलों के नेताओं और पदाधिकारियों को विद्रोह करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
शहडोल में गोंगपा बनी बीच का कांटा...
वहीं शहडोल में कांग्रेस प्रत्याशी राजेश नंदिनी सिंह और भाजपा प्रत्याशी दलपत सिंह परस्ते की जीत के बीच गोंगपा के रामरतन सिंह पावले कांटा बने हुए हैं। यहां कांग्रेस प्रत्याशी निवर्तमान सांसद राजेश नंदिनी सिंह और भाजपा प्रत्याशी पूर्व सांसद दलपत सिंह परस्ते के बीच ही मुख्य मुकाबला है। इस सीट पर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का भी दखल है। गोंगपा से रामरतन सिंह पावले फिर मैदान में हैं। यहां आम आदमी पार्टी ने विजय कोल को उम्मीदवार बनाया है, लेकिन उनका कोई खास असर नहीं बताया जा रहा है। यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच ही मुख्य मुकाबला है। हालांकि दोनों दल अपने ही घर के अंतर्कलह से जूझ रहे हैं। भाजपा की स्थिति तो यहां तक पहुंच गई कि झंडा-बैनर लगाने का ठेका देना पड़ा। भाजपा में तीन खेमे बन गए हैं। लोकसभा प्रभारी, उप प्रभारी एवं प्रत्याशी का अलग-अलग खेमा बन गया है और व्यवस्थाओं को लेकर खींच-तान मची हुई है। कांग्रेस का एक बड़ा खेमा खामोश है। दोनों दलों में चुनाव प्रचार की व्यवस्था को लेकर अंतर्कलह पनप रहा है। दलपत सिंह का चुनाव प्रचार अपने गृह क्षेत्र अनूपपुर जिले तक ही सिमटा हुआ है। यदि शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र मोदी का फैक्टर भाजपा का साथ नहीं दे पाया तो दलपत सिंह के सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। भाजपा जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं का उत्साह भी कमजोर पड़ गया है। हालांकि प्रत्याशी घोषणा के बाद से ही युवा मोर्चा में विरोध के स्वर उभर आए थे जिसका असर प्रचार-प्रसार में दिख रहा है। चुनाव कार्य की जिम्मेदारी संभाल रहे पदाधिकारी इस बात को लेकर निश्चिंत है और वह यह मान बैठे है कि जब तक शिवराज सिंह व नरेन्द्र मोदी का नाम उनके साथ है तब तक उन्हें चिंता करने की बात नहीं है। कार्यकर्ता भले ही असंतुष्ट रहे, लेकिन मतदाता उनका साथ देगा ही। कांग्रेस प्रत्याशी राजेश नंदिनी सिंह ने अपनी बेटी हिमाद्री सिंह को चुनाव प्रचार में उतार दिया है। विधानसभा चुनाव में भी बेटी के प्रचार का फायदा कांग्रेस को मिला है और लोकसभा में भी मिलेगा ऐसा माना जा रहा है। कांग्रेस का एक बड़ा खेमा प्रचार-प्रसार से दूरी बनाए हुए है और अब तक व्यवस्था के इंतजार में है।
यहां भितरघात में उलझे समीकरण
इसके अलावा कई सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को भितरघात का डर भी सता रहा है। कहीं पार्टी के पदाधिकारी खुलकर विरोध कर रहे हैं, तो कहीं छिपकर विरोधी का प्रचार करने लगे हैं। ऐसे नेता अपने ही प्रत्याशी की रणनीति पर पानी फेरने का काम भी कर रहे हैं।
होशंगाबाद संसदीय सीट...
राव उदयप्रताप सिंह को भाजपा प्रत्याशी बनाए जाने से नरसिंहपुर जिले के कई वरिष्ठ नेता नाखुश हैं। कांग्रेस का आलम भी यही है। पार्टी के कई नेता पड़ोसी संसदीय क्षेत्रों में चले गए हैं। कांग्रेस के होशंगाबाद जिला उपाध्यक्ष पीयूष शर्मा को भाजपा प्रत्याशी राव उदयप्रताप सिंह ने अपनी एक सभा में माला पहनाकर भाजपा में शामिल कर लिया, लेकिन भाजपा जिला इकाई होशंगाबाद के अध्यक्ष और कार्यकारिणी को यह बात रास नहीं आई। उनके इस्तीफे की पेशकश और बढ़ते विरोध को देखकर अंतत: भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष का भाजपा में प्रवेश रोक दिया।ं के।
जबलपुर
इस सीट पर भी दलों को भितरघात का डर सता रहा है। पाटन से विधानसभा चुनाव हारने के बाद पूर्व मंत्री अजय विश्नोई यहां से टिकट मांग रहे थे। टिकट नहीं मिलने से नाराज विश्नोई को चुनाव प्रबंधन का काम सौंपकर सतना भेज दिया गया है। माना जा रहा है कि भाजपा ने भितरघात के डर से ऐसा किया है। वहीं कांग्रेस ने भी सभी दावेदारों को दरकिनार कर विवेक तन्खा को टिकट दी है। इससे पार्टी के कई पुराने दिग्गज नेता नाराज बताए जा रहे हैं। हालांकि तन्खा का विरोध खुलकर किसी ने नहीं किया है, लेकिन कई नेता प्रचार में दिखाई नहीं दे रहे हैं।
छिंदवाड़ा
महाकोशल क्षेत्र की इस सीट पर दोनों हीं दलों में अब तक अंतर्कलह जैसी कोई बात सामने नहीं आई है। बताया जाता है कि दोनों ही दलों के नेता पहले से ही मानकर चल रहे थे कि टिकट किसको मिलेगी। भाजपा में जरूर एक-दो नेता चुनाव प्रचार में सक्रिय नहीं दिख रहे हैं, लेकिन पार्टी इससे इनकार करती है।
मंडला
पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव में टिकट मांग रहे पूर्व भाजपा विधायक शिवराज शाह चुनाव को लेकर उत्साहित नजर नहीं आ रहे। वे भाजपा प्रत्याशी फग्गन सिंह कुलस्ते के प्रचार अभियान में भी दिखाई नहीं दे रहे। ऐसी ही स्थिति कांग्रेस प्रत्याशी ओंकार मरकाम के साथ है। डिंडौरी जिले के पार्टी पदाधिकारी खुलकर उनका विरोध कर चुके हैं। उन्होंने प्रत्याशी पर कई आरोप लगाते हुए सोनिया गांधी तक को पत्र लिखा है।
सीधी
यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों ही भितरघात से जूझ रही हैं। सीधी और सिंगरौली जिले के भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रचार करने से कन्नी काट रहे हैं। टिकट नहीं मिलने से निवर्तमान सांसद गोविन्द मिश्रा नाराज चल रहे हैं। उनके साथ टिकट के अन्य दावेदार भी रीति पाठक का प्रचार नहीं कर रहे हैं। बताया जाता है कि कुछ पार्टी नेता तो अपने ही उम्मीदवार को हराने के लिए जाल बिछा रहे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी इन्द्रजीत कुमार को भी पार्टी में विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इन्द्रजीत को टिकट मिलने के बाद कांग्रेस के पूर्व मंत्री वंशमणि वर्मा के साथ कई नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं। अजय सिंह को यहां से टिकट नहीं मिलने के कारण उनके समर्थक भी नाराज हैं।
उज्जैन,देवास में नमो और संघ के सहारे
भगवा ब्रिगेड के पुरातन गढ़ मालवा की लोकसभा सीटों उज्जैन और देवास को बरसों बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने खोया था। लेकिन इस बार नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान के सहारे भाजपा इस बार यहां चुनावी नैया पार करने की तैयारी कर रही है।
उज्जैन संसदीय क्षेत्र में भाजपा ने इस बार विक्रम विश्वविद्यालय की दर्शनशास्त्र अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष डॉ.चिंतामणि मालवीय को नए चेहरे के रूप में मैदान में उतार दिया। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक यह प्रयोग जनता छोड़ पार्टी के ही कुछ नेताओं और कई कार्यकर्ताओं के गले अब तक नहीं उतर पाया है। देवास संसदीय सीट से भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव थावरचंद गेहलोत यहां से चुनाव लड़ते और जीतते आए। पिछले चुनाव में कांग्रेस के सज्जनसिंह वर्मा से हारे और इस बार उन्हें पार्टी ने टिकट नहीं दिया। उनकी जगह आगर के विधायक और पूर्व मंत्री मनोहर ऊंटवाल को मैदान में उतारा गया है। रतलाम जिले की आलोट विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुके ऊंटवाल की उम्मीदवारी को पार्टी का ही एक धड़ा अब तक नहीं पचा पाया है।
भाजपा के कई उम्मीदवार 55 पार भी
इस लोकसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदेश में सबसे ज्यादा बुजुर्गों को मैदान में उतारा है। दिलीप सिंह भूरिया, सुमित्रा महाजन, लक्ष्मीनारायण यादव, दलपत सिंह परस्ते, नागेंद्र सिंह, भागीरथ प्रसाद ये ऐस चेहरे हैं, जो 70 की उम्र पार कर चुके हैं। इसके बाद 55 पार करने वाले एक दर्जन उम्मीदवार हैं। झाबुआ में 80 साल के दिलीप सिंह भूरिया का विकल्प दिया गया है। इंदौर में 70 साल की सुमित्रा महाजन हैं। सागर में 70 साल के ही लक्ष्मीनारायण यादव हैं। भिंड में इतनी ही उम्र के भागीरथ प्रसाद हैं। शहडोल में दलपत सिंह परस्ते, खजुराहो में नागेंद्र सिंह हैं। इसके बाद 55 और 60 की उम्र के नेताओं की बयार है। विदिशा से सुषमा स्वराज, ग्वालियर से भाजपा प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, मुरैना में अनूप मिश्रा, खंडवा में नंदकुमार सिंह चौहान, छिंदवाड़ा में चौधरी चंद्रभान सिंह, शिवपुरी में जयभान सिंह पवैया, होशंगाबाद में राव उदयप्रताप सिंह, जबलपुर में राकेश सिंह, दमोह में प्रहलाद पटेल, राजगढ़ में रोडमल नागर, रीवा में जनार्दन मिश्रा, मंदसौर में सुधीर गुप्ता हैं। भाजपा में 50 साल से कम उम्र के तीन ही प्रत्याशी हैं। भोपाल में आलोक संजर, सीधी में रीति पाठक और खरगौन में सुभाष पटेल।

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

1000 करोड़ खर्च होंगे राहुल की ब्रैंडिंग पर !

कांग्रेस जमीनी स्तर के वोटर्स तक पहुंचने के लिए संवाद का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। इसी के मद्देनजर पार्टी अपने प्रचार और विज्ञापन के लिए कम्युनिकेशन के हर मंच का इस्तेमाल करने की योजना बना रही है। गौरतलब है कि कांग्रेस के प्रचार की इस पूरी कवायद के केंद्र में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी हैं। जिनकी इमेज ब्रैंडिंग के लिए पार्टी बड़े पैमाने पर विज्ञापन और प्रचार कर रही है। राहुल को केंद्र में रखकर पार्टी की बात पहुंचाने के लिए कांग्रेस प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया मसलन- टि्वटर, फेसबुक और यूट्यूब के साथ-साथ एसएमएस जैसे माध्यमों की मदद ली जा रही है। एक हजार करोड़ होंगे खर्च : शुरू में कहा गया था कि राहुल गांधी की इमेज ब्रैंडिंग के लिए 500 करोड़ का कैंपेन प्लान रखा गया था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक, चुनावों के नजदीक आते-आते इसके अब दोगुने तकरीबन 1000 करोड़ के होने की संभावना जताई जा रही है। अब तक 300 करोड़ खर्च : जनवरी से लेकर मार्च तक सिर्फ दो महीने में राहुल पर केंद्रित विज्ञापनों पर अब तक पार्टी 300 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। कांग्रेस के लिए यह काम जापान की एक बड़ी पीआर कंपनी डेन्सुक सहित स्पैन, परफेक्ट रिलेशन, पीनैकल जैसी देश की बड़ी पीआर व इवेंट मैनेजमेंट कपंनियां कर रही है। ये तीनों कंपनिया मिलकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विज्ञापनों और कंटेट की जिम्मेदारी संभाल रही हैं जबकि परफेक्ट रिलेशंस सोशल मीडिया मसलन टि्वटर, फेसबुक व यूट्यूब पर कांग्रेस व राहुल गांधी से जुड़ी जानकारी उपलब्ध करा रही है। आने वाले दिनों में कांग्रेस की योजना एसएमएस के जरिए राहुल का संदेश आम लोगों तक पहुंचाने की है। इसका जिम्मेदारी पीनैकल नामक कंपनी को दी गई है। इस सर्विस में राहुल गांधी मैसेज उन्हीं की आवाज में देने की योजना पर काम चल रहा है। इस सर्विस के जरिए मोबाइल यूजर्स को अपने इलाके के कैंडिडेट का नाम व उसके बारे में जानकारी, पोलिंग की डेट, उसकी सीट पर महत्वपूर्ण नेताओं की रैलियों व सभाओं की जानकारी वगैरह मिल सकेगी।

छह गुना बढ़ी सोनिया की संपत्ति

राहुल को चुकाना है सोनिया गांधी के 9 लाख रुपए! कांग्रेस प्रेजिडेंट सोनिया गांधी ने बुधवार को रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से दाखिल अपने नामांकन में अपने पास कुल 9 करोड़ 28 लाख 95 हजार रुपए की संपत्ति घोषित की। यह 2009 में ऐलान की गई संपत्ति से साढे़ छह गुना से ज्यादा है। सोनिया द्वारा दाखिल हलफनामे के मुताबिक, उन्होंने अपने सांसद बेटे राहुल गांधी को 9 लाख रुपए बतौर कर्ज दिए हैं। उन्होंने फाइनैंशल ईयर 2012-13 में दाखिल इनकम टैक्स रिटर्न में अपनी कुल इनकम 14 लाख 21 हजार 740 रुपए बताई है। सोनिया गांधी कांग्रेस के डेप्युटी प्रेजिडेंट राहुल गांधी के साथ जिला निर्वाचन अधिकारी अदिति सिंह के समक्ष नामांकन करने पहुंची थीं। सोनिया द्वारा दिए गए संपत्ति के ब्यौरे के मुताबिक उनके पास कुल 9 करोड़ 28 लाख 95 हजार 287 रुपए 73 पैसे की संपत्ति है। इसमें 2 करोड़ 81 लाख 50 हजार 387 रुपए 73 पैसे की चल संपत्ति और 6 करोड़ 47 लाख 44 हजार 900 रुपए की अचल संपत्ति शामिल है। इसमें इटली में 19 लाख 90 हजार 320 रुपए की पुश्तैनी संपत्ति भी शामिल है। सोनिया ने अपने हलफनामे में कहा कि उनके पास कोई कार नहीं है। हलफनामे के मुताबिक, सोनिया की चल संपत्ति में 85 हजार रुपए नकद, बैंक में 66 लाख 8 हजार 638 रुपए 12 पैसे जमा, 10 लाख रुपए के बॉन्ड, एक लाख नब्बे हजार 100 रुपए के शेयर, 82 लाख 20 हजार 437 रुपए 60 पैसे के म्यूचुअल फंड, पीपीएफ के तौर पर 82 लाख 49 हजार 877 रुपए एक पैसे का निवेश, राष्ट्रीय बचत योजना के तहत दो लाख 86 हजार 237 रुपए का निवेश और 62 लाख 26 हजार 547 रुपए की जूलरी है। सोनिया के पास 6 करोड़ 47 लाख 44 हजार 900 रुपए की अचल संपत्ति भी है। इसमें डेरामंडी गांव में 4 करोड़ 86 लाख 74 हजार 600 रुपए की जमीन और सुल्तानपुर गांव में एक करोड़ 40 लाख 79 हजार 980 रुपए की जमीन शामिल है। इसके अलावा इसमें इटली में 19 लाख 90 हजार 320 रुपए की पुश्तैनी संपत्ति भी शामिल है। सोनिया ने 2009 में पिछले लोकसभा चुनाव के लिए रायबरेली से ही नामांकन दाखिल करते वक्त अपने पास एक करोड़ 37 लाख 94 हजार 768 रुपए की संपत्ति होना बताया था। उस लिहाज से देखें तो पिछले 5 साल में सोनिया की संपत्ति में 6.73 गुना का इजाफा हुआ है। 2009 में हुए पिछले लोकसभा चुनाव में नामांकन के वक्त दाखिल हलफनामे के मुताबिक सोनिया के पास 75 हजार रुपए नकद, बैंक में 28 लाख 661 रुपए और 20 लाख रुपए के म्युचुअल फंड थे। इसके अलावा उनके पास 12 लाख रुपए के बॉन्ड, राष्ट्रीय बचत योजना (एनएसएस) में एक लाख 99 हजार 380 रुपए का निवेश और पीपीएफ के 24 लाख 88 हजार 887 रुपए थे। साथ ही उनके 29 लाख 45 हजार 540 रुपए के गहने थे। सोनिया के पास तब भी कोई गाड़ी नहीं थी। पिछले हलफनामे के मुताबिक सोनिया के पास दो लाख 19,300 रुपए की जमीन थी। इटली में 18 लाख 5 हजार रुपए का पुश्तैनी मकान भी था, यानी उनके पास कुल एक करोड़ 37 लाख 94 हजार 768 रुपए की संपत्ति थी।

हत्‍या से लेकर भ्रष्‍टाचार तक के आरोपी चुनाव मैदान में

भोपाल। लोकसभा चुनाव के मद्दे नजर आपराधिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि के मुद्दे पर इलेक्शन वाच ने बुधवार को प्रेस वार्ता का आयोजन किया। इलेक्शन वाच के प्रदाधिकारी राकेश दीवान, सचिन जैन और रोली शिवहरे ने लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण में होने वाले 9 सीटों पर लड़ रहे 118 उमीदवारों के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। वॉच की टीम ने बताया कि 118 उम्मीदवारों में तीन प्रत्याशी ऐसे है, जिनेके पास संपति शून्‍य है। सीधी से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे ब्रह्मानंद प्रतापसे, मंडला से वेसाहु मरावी और अंबेडकराई पार्टी ऑफ इंडिया से छिंदवाड़ा उम्मीदवार रमेश के पास संपति शून्‍य हैं। सबसे धनाढ्य प्रत्याशी वाच की टीम ने बताया कि छिंदवाड़ा से चुनाव मैदान में उतरे कांग्रेस के उमीदवार कमलनाथ ने 206 करोड़, जबलपुर से उमीदवार विवेक तंखा ने 42 करोड़ से ज्यादा और सतना से कांग्रेस उम्मीदवार अजय सिंह ने 29 करोड़ से ज्यादा संपति का ब्योरा आयोग को अपने द्वारा भरे पर्चे में दर्शाया है! 118 में से 40 प्रतिशत प्रत्याशीयों पर सबसे ज्यjदा देनदारी टीम ने बताया कि 118 उम्मीदवारों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 40 प्रतिशत उम्मीदवार ऐसे है जिनके उपर देनदारी है। इनमे चार प्रत्याशियों को सबसे ज्यादा देन दार माना है। छिंदवाड़ा से कमलनाथ पर 5.11 करोड़, रीवा से बसपा उम्मीदवार देवराज सिंह पटेल पर 1.79 करोड़, जबलपुर से चुनाव मैदान में उतरे मोहमद आफताब आलम पर 1.40 करोड़ और सतना से अजय सिंह पर 1.38 करोड़ की देनदारी है। वहीं टीम ने बताया कि 110 प्रत्याशियों में से 75 ने आयकर संबंधी घोषणा नहीं की है। इसी तरह 43 प्रत्याशियों ने पेन कार्ड संबंधी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। चार उम्मीदवारों पर दर्ज है अपराधिक मामले टीम ने बताया दलवार जो अपराधिक जानकारी प्राप्त हुई है उनमें भाजपा के 9 उमीदवारों में से दो पर अपराधिक मामले दर्ज है। वहीं आम आदमी पार्टी के मैदान में उतरे 7 उम्मीदवारों में से एक पर और बसपा के 8 उम्मीदवारों में से एक पर अपराधिक मामले दर्ज है।