गुरुवार, 20 मार्च 2014

छत्तीसगढ़ की सीमा घेरेगी पड़ोसी राज्यों की फोर्स

छत्तीसगढ़ सीमा में नक्सलियों की घुसपैठ को नाकाम करने के लिए पड़ोसी राज्यों की पुलिस से मदद ली जा रही है। हाल ही में आंध्रप्रदेश, ओडिशा, उप्र, बिहार और झारखंड के पुलिस अधिकारियों के साथ राज्य के अफसरों की बार्डर मीटिंग में लोकसभा चुनाव में आतंक फैलाने के लिए नक्सलियों की घुसपैठ को नाकाम करने की फूलप्रूफ रणनीति तय की गई। अफसरों का कहना है कि शांतिपूर्ण ढंग से संपन्ना हुए विधानसभा चुनाव की तर्ज पर लोकसभा चुनाव में भी अर्धसैनिक बलों की मदद से राज्य पुलिस बल नक्सलगढ़ के जंगलों की घेराबंदी करेगी। इससे नक्सलियों को जंगल से बाहर निकलने का मौका नहीं मिलेगा और वे कोई भी वारदात नहीं कर पाएंगे। राज्य के सीमावर्ती ओडिशा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मप्र, उप्र, बिहार और झारखंड सीमा को सील किया जाएगा। वहां पर पड़ोसी राज्यों की फोर्स की मौजूदगी से नक्सलियों के भागने के रास्ते बंद कर दिए जाएंगे। नक्सलियों के खिलाफ उच्च स्तरीय अभियान चलाकर पड़ोसी राज्य की फोर्स के साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाएगा।
पुलिस मुख्यालय के सूत्रों ने बताया कि छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव तीन चरणों में होने है। बस्तर में पहले चरण तथा दूसरे चरण में कांकेर, राजनांदगांव और महासमुंद में चुनाव होंगे। बस्तर, कांकेर की सीमाएं ओडिशा से लगी हुई हैं। इन क्षेत्रों में फोर्स कड़ी निगरानी रखेगी। सीआरपीएफ और जिला पुलिस बल के सहयोग से चुनाव से पहले सर्च अभियान चलाया जाएगा। पुलिस मुख्यालय में ओडिशा के पुलिस अफसरों के साथ हुई बैठक में यह तय किया गया कि नक्सलियों के छिपने तथा कई अन्य स्थानों की जानकारी निरंतर देते रहेंगे। गौरतलब है कि मुख्य निर्वाचन आयोग के निर्देश पर आंध्रप्रदेश, मप्र, बिहार, उप्र तथा झारखंड के अफसरों के साथ प्रदेश के सीमावर्ती रेंज के अफसरों की बैठक भी हो चुकी है। बैठक में नक्सलियों के घुसपैठ को सख्ती से रोकने की रणनीति तय की गई।
सुरक्षा व्यवस्था कड़ी, फोर्स अलर्ट
लोकसभा चुनाव में सुरक्षा व्यवस्था के लिए बनाए गए नोडल अधिकारी आईजी जीपी सिंह ने 'नईदुनिया' को बताया कि चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने की पूरी तैयारी कर ली गई है। चुनाव कराने आए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों को क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के बारे में जानकारी दी जा रही है, ताकि उन्हें ऑपरेशन के दौरान कोई दिक्कत न हो। सीमा पर नक्सलियों की घुसपैठ, अवैध हथियार तथा शराब आदि की तस्करी रोकने फोर्स को हाईअलर्ट रहने को कहा गया है। फोर्स की संख्या कितनी होगी फिलहाल सुरक्षा की दृष्टि से इसका खुलासा करने से अफसर इंकार कर रहे है।
दुर्गम इलाकों में हेलीकॉप्टर से जाएगा मतदान दल पुलिस सूत्रों ने बताया कि बस्तर व राजनांदगांव क्षेत्र के कुछ ऐसे दुर्गम इलाके हैं, जहां मतदान दलों को इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के साथ मतदान केंद्रों तक सुरक्षित पहुंचाना चुनौती भरा काम है। यहां पर लगातार नक्सली गतिविधियां होती रहती हैं। मतदान को प्रभावित करने के लिए नक्सली मतदान दलों को निशाना बनाकर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे हालात में मतदान दलों को वायुसेना के हेलीकॉप्टर से पूरी सुरक्षा व्यवस्था के साथ वहां पर पहुंचाया जाएगा।

आखिर फजीहत कराकर ही माने 'लालÓ

लगभग 24 घंटे तक चले हाई वोल्टेज पोलिटिकल ड्रामे में अपनी फजीहत कराने के बाद 20 मार्च की शाम को भाजपा के 'लौह पुरुषÓ लालकृष्ण आडवाणी ने अपना 'बालÓ हठ छोड़ कर संसदीय बोर्ड के फैसले के अनुरूप गुजरात के गांधीनगर से ही चुनाव लडऩे पर रजामंदी दे दी। लेकिन जिस तरह भोपाल से चुनाव लडऩे पर अड़े आडवाणी को गांधीनगर सीट से चुनाव लडऩे के लिए मजबुर किया गया इस एपीसोड से यह तो जाहिर हो गया कि अब भाजपा में लालकृष्ण केवल शोपीस बनकर रह गए हैं। इस बात को आडवाणी भी भली भांति समझते हैं,लेकिन पीएम बनने की चाह में वे अपनी फजीहत करवा बैठते हैं। एक तरफ जहां भाजपा के बड़े नेता और कार्यकर्ता प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का नाम लिए थक नहीं रहे वहीं दूसरी तरफ भाजपा के आडवाणी इसे पचा नहीं पा रहे इसलिए उन्हें जब भी मौका मिलता है अपने दर्द को सबके सामने लाने से पीछे नहीं हटते। गौरतलब है कि 19 मार्च को जारी भाजपा की लोकसभा लिस्ट में आडवाणी को लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए गांधीनगर से उम्मीदवार बनाया गया था। लेकिन गांधीनगर से पांच बार संसद के लिए चुने जा चुके आडवाणी इस बार गुजरात से चुनाव लडऩे को तैयार नहीं थे। आडवाणी इस बार नरेंद्र मोदी के गुजरात की जगह शिवराज सिंह चौहान के मध्य प्रदेश से लोकसभा की नैया पार करना चाहते थे। आडवाणी के गांधीनगर से चुनाव न लडऩे पर राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा थी कि आडवाणी को अपनी ही पार्टी की गुजरात इकाई पर भरोसा नहीं है। कहा जा रहा था कि मोदी के पीएम उम्मीदवार बनने के समय चूंकि आडवाणी ने विरोध किया था, इसलिए मुमकिन है आडवाणी को गांधीनगर में भीतरघात का सामना करना पड़े। इस कारण आडवाणी किसी तरह का राजनीतिक जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। प्रधानमंत्री पद की चाह भी भाजपा की तरफ से पीएम इन वेटिंग रहे आडवाणी भोपाल से चुनाव लडऩे की जिद पर शायद इसलिए भी अड़े थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर एनडीए लोकसभा चुनाव में बहुमत हासिल करती है और अगर मोदी के नाम सहमति नहीं बनी तो मध्य प्रदेश से जीतने वाले सभी सांसद आडवाणी के पीछे चट्टान की तरह खड़े होकर उनका साथ दे सकते हैं। इसलिए आडवाणी किसी भी सूरत में लोकसभा चुनाव जीतना चाहते हैं। राजनीतिक विश£ेषकों का मानना कि भले ही मोदी पीएम पद के उम्मीदवार हैं, लेकिन अगर भाजपा 170-180 सीटों पर अटकी तो आडवाणी की लॉटरी निकल सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि मोदी से दूरी बनाकर रखने वाली पार्टियां आडवाणी के नाम पर सहमत हो सकती हैं। संघ के कड़े रूख के बाद पड़े नरम संसदीय बोर्ड द्वारा आडवाणी को गांधीनगर सीट से लड़ाने के एलान के तुरंत बाद सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी उन्हें मनाने पहुंचे थे। सुषमा और गडकरी ने करीब एक घंटे आडवाणी के घर पर उनसे बातचीत की थी। लेकिन, आडवाणी ने साफ कर दिया कि वह भोपाल से ही चुनाव लड़ेंगे। आडवाणी ने भाजपा आलाकमान से कहा कि उन्हें अपनी सीट चुनने का अधिकार चाहिए। वह खुद तय करना चाहते हैं कि उन्हें किस सीट से लडऩा है। जब आडवाणी गांधी नगर की वजाय भोपाल से चुनाव लडऩे की जिद पर अड़ रहे तो भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने 19 मार्च को दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के झंडेवालान कार्यालय में संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की थी। समझा जाता है कि दो घंटे तक चली इस बैठक में गांधीनगर से भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की उम्मीदवारी एवं अन्य मुद्दों पर चर्चा की गई थी। मोदी चुनाव समिति की बैठक के बाद सीधे संघ कार्यालय गए थे। उसके बाद आडवाणी को संघ ने सख्त चेतावनी दी थी। संघ ने कहा कि, 'लडऩा है तो गांधीनगर से लड़ें वरना घर बैठेंÓ। संघ ने आडवाणी से साफ कह दिया कि सभी नेताओं को भाजपा संसदीय बोर्ड का फैसला मानना चाहिए, संसदीय बोर्ड ने आडवाणी को गांधीनगर से टिकट दिया है। उसके बाद भी चौबीस घंटे में लगातार आडवाणी को मनाने की कोशिशें होती रहीं। संघ ने पुन:हस्तक्षेप किया, लेकिन परदे से। भाजपा नेताओं को संघ ने सलाह दी कि आडवाणी को हर स्तर पर समझाने की कोशिश होनी चाहिए पर पार्टी हित सबसे ऊपर है। इसके बाद खुद मोदी ने उनसे मुलाकात की। राजनाथ भी कभी खुद तो कभी दूसरे वरिष्ठ नेताओं के जरिए उन्हें समझाते रहे। उसके बाद का खाका तैयार था। आखिरकार आडवाणी की मंशा के अनुरूप ही राजनाथ ने बयान जारी कर कहा कि अपने चुनाव क्षेत्र का फैसला खुद आडवाणी लें। 20 मार्च की शाम होते-होते आडवाणी मान चुके थे। तब तक उनकी इतनी किरकिरी हो चुकी थी कि उन्हें भाजपा का विभिषण तक कहा जाने लगा। 'लौह पुरुषÓ का दुविधाग्रस्त मौन अपनी 'लौह पुरुषÓ वाली छवि के बल पर अटल बिहारी बाजपेयी के साथ मिलकर भाजपा को इस मुकाम तक पहुंचाने वाले आडवाणी की पीएम बनने की लालसा है। लेकिन जिस तरह से उनकी इच्छा को दबाकर पार्टी ने नरेंद्र मोदी को पीएम का उम्मीदवार घोषित किया है उससे वह आहत हैं। इस दुविधाग्रस्त स्थिति में जब भी मौका मिलता है वे मौन धारण कर लेते हैं,जिससे पार्टी के रणनीतिकार दुविधा में फंस जाते हैं। हालांकि आडवाणी का एक बार फिर मौन टूटने के बाद पिछले छह-सात महीने में भाजपा दूसरी बार थोड़ा डगमगा कर फिर संभली है। एक तरह से गोवा घटनाक्रम-दो का भी अंत हो गया। गोवा कार्यकारिणी में नरेंद्र मोदी का कद बढ़ाने के बाद भाजपा के अंदर शुरू हुए घटनाक्रम की तर्ज पर ही आडवाणी ने 20 मार्च को भी लड़ाई खत्म कर दी। बहरहाल, आडवाणी को मना तो लिया गया लेकिन यह संकेत भी दे दिया गया कि चुनाव की दहलीज पर खड़ी पार्टी कोई भी फैसला किसी के दबाव में नहीं करेगी। आडवाणी का बाल हठ देख पार्टी के बड़े नेता मीडिया के सामने सफाई दे-देकर थक गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आडवाणी अगर इसी तरह से बाल हठ करते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब उनका भी हाल मशहूर वकील राम जेठमलानी जैसा हो जाएगा। हारे लालकृष्ण की भावुक सफाई 24 घंटे के ड्रामे के दौरान जब संगठन ने आडवाणी की बात नहीं मानी तो आखिरकार उन्होंने अपनी जिद छोड़ते हुए भाव विव्हल होकर एक बयान में कहा कि वह पार्टी नेताओं के रुख से भावुक हो गए हैं। पूरे संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति ने मेरे लिए गांधीनगर सीट चुनी है, जबकि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गांधीनगर या भोपाल में कोई भी सीट चुनने का विकल्प मेरे लिए छोड़ दिया है। मैं खुद गांधीनगर से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहा हूं। लिहाजा, मैंने इस बार भी गांधीनगर से चुनाव लडऩे का मन बनाया है। उन्होंने कहा कि पार्टी के सहयोगियों ने सीट चुनने का फैसला मेरे ऊपर छोड़ा था। अपने सहयोगियों की बातों ने मेरे दिल को छू लिया है। मैं हमेशा से गांधीनगर से जुड़ा रहा हूं। 1991 से मैं यहां से चुनाव लड़ता रहा हूं। इस बार भी मैं यहीं से चुनाव लड़ूंगा। मैं गुजरात और मध्य प्रदेश भाजपा यूनिट को धन्यवाद देता हूं।Ó इसके अतिरिक्त आडवाणी ने भोपाल के मौजूदा सांसद कैलाश जोशी, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान, राज्य भाजपा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह का भी धन्यवाद किया। भोपाल में होर्डिग से फजीहत आडवाणी के चुनाव क्षेत्र को लेकर जिस दिन दिल्ली में संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति मंथन करने वाली थी उस दिन यानी 19 मार्च की सुबह उनके भोपाल से लोकसभा चुनाव लडऩे की चर्चा के साथ ही जिला भाजपा की तरफ से रोशनपुरा, कमला पार्क और वीआईपी रोड पर उनके स्वागत में होर्डिंग लग गए। भाजपा के भीतर चर्चा थी कि आलोक शर्मा के विरोधी कुछ नेताओं ने यह होर्डिंग लगाए हैं। शाम होते-होते इनमें से दो होर्डिंग हट गए। कांग्रेस ने इस पर प्रतिक्रिया दी कि यह 'होर्डिंग वारÓ भाजपा के भीतर मची खींचतान और गुटबाजी का नतीजा है। भाजपा ने इसे कार्यकर्ताओं का उत्साह बताया। उधर, जिला भाजपा अध्यक्ष आलोक शर्मा ने कहा कि कुछ उत्साही कार्यकर्ताओं ने यह होर्डिंग लगा दिए थे। शिवराज से लाल को बड़ी आस नरेंद्र मोदी को इस मुकाम तक पहुंचाने में लालकृष्ण आडवाणी का अहम रोल रहा है। लेकिन जबसे मोदी का कद उनसे बड़ा हुआ है उन्होंने मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरफदारी शरू कर दी है। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले आडवाणी ने ग्वालियर में एक कार्यक्रम में परोक्ष रूप से शिवराज को मोदी से बेहतर सीएम बता दिया था। उन्होंने कहा था कि मोदी ने तो पहले से स्वस्थ राज्य को उत्कृष्ट बनाया है, जबकि शिवराज ने बीमारू राज्य को विकास प्रदेश में बदल दिया। आडवाणी ने शिवराज को वाजपेयी जैसा नेता भी करार दिया था। भाजपा के एक बड़े नेता की तरफ से दिए गए इस से यह समझा जाने लगा कि पार्टी में सब कुछ सही नहीं चल रहा। जानकार इसके पीछे की जो वजह मान रहे हैं वह उनका पार्टी द्वारा लगातार उपेक्षित किया जाना है। इस समय आडवाणी अपनी बात पार्टी में पुरजोर तरीके से नहीं रख पा रहे हैं। पार्टी के बड़े नेता से लेकर तमाम कार्यकर्ता तक यह मानकर चल रहे हैं कि आडवाणी का वक्त समाप्त हो गया है और अब दौर मोदी जैसे लोकप्रिय नेता का आ चुका है। वैसे आडवाणी अपनी घटती वरीयता के पीछे मोदी को ही वजह मानते हैं। तभी तो एक तरफ पूरी पार्टी मोदी की सुर में सुर में मिला रही है वहीं आडवाणी अपना अलग ही राग अलाप रहे हैं। संघ के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि लाल को शिवराज में अपने मान-सम्मान की आस दिख रही है। इसलिए वह शिवराज को मोदी से बेहतर बताने का कोई भी मौका नहीं चुकते हैं।

गजब का खेल बीजेपी के सारे समीकरण फेल

बीजेपी के सबसे सीनियर नेता और फाउंडर मेंबर लालकृष्ण आडवाणी के साथ जिस तरह का व्यवहार हो रहा है, उसने भी निश्चित रूप से कई पुराने भाजपाइयों को ठेस पहुंचाई होगी। जब तक उन्होंने गांधीनगर से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई, किसी ने उन्हें कोई आश्वासन नहीं दिया, और जैसे ही वे भोपाल को गले लगाने को तैयार दिखने लगे, पार्टी ने उन्हें गांधीनगर का टिकट दे दिया। क्या गजब का खेल है, इस चुनाव में तो, सारे समीकरण फेल हैं। जगदम्बिका पाल, राम कृपाल यादव, मनोज तिवारी.. आप जानते हैं इन तीनों में कॉमन क्या है? ये तीनों ही बीजेपी की धुर विरोधी रही पार्टियों के सदस्य थे और मनोज तिवारी को छोड़ दिया जाए, तो बाकी दो तो अपनी-अपनी पार्टियों के प्रमुख नेताओं में शामिल थे। इन्होंने आज पार्टी छोड़ी, अगली दो-चार रातों में पुरानी विचारधारा से पीछा छुड़ाया, और तुरंत ही भगवा विचारधारा में रंग गए। है न कमाल की बात! और इससे भी ज्यादा कमाल तो बीजेपी के थिंक टैंक ने दिखाया। इन साहब लोगों को तुरंत ही अपने उन कार्यकर्ताओं पर तरजीह देते हुए लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट थमा दिया, जो सालों से पार्टी की विचारधारा अपने कंधों पर ढोते रहे हैं। जगदम्बिका पाल का तो व्यापक विरोध हुआ था। बीजेपी कार्यकर्ता साफ कह रहे थे कि अगर पाल को टिकट दिया गया, तो वे पार्टी ही छोड़ देंगे। फिर भी इन सारे विरोधों को दरकिनार करते हुए बीजेपी की संसदीय बोर्ड ने पाल को टिकट दे दिया। अब आप ही बताइए, उन कार्यकर्ताओं के दिलों पर क्या गुजरेगी जिन्होंने सालों अपने खून-पसीने से पार्टी की विचारधारा को सींचा। जिन कार्यकर्ताओं को इन्हीं जगदम्बिका पाल ने न जाने कितने ही मौकों पर गरियाया होगा, उन्हीं कार्यकर्ताओं से आप इनके पक्ष में जय-जयकार करवाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति ऐसा नहीं करेगा। दशकों तक कांग्रेसी विचारधारा के झंडाबरदार रहे पाल भी एकाएक चंद दिनों में भगवा विचारधारा में कैसे रंग गए, यह भी सोचने वाली बात है। इतनी तेजी से तो गिरगिट भी अपना रंग नहीं बदलता होगा। रामकृपाल यादव भी लालू प्रसाद यादव के पुराने साथी रहे हैं। उन्होंने भी टिकट न मिलने से नाराज होकर पार्टी छोड़ी, बीजेपी में शामिल हुए, और बीजेपी ने भी अपने समर्पित कार्यकर्ताओं की छाती पर मूंग दलते हुए उन्हें पार्टी का टिकट थमा दिया। जो रामकृपाल सालों तक राजनाथ, जोशी और मोदी को गालियां देते रहे, उन्हें पार्टी में शामिल कर टिकट दे दिया गया, और जो कार्यकर्ता इन्हीं नेताओं की जय-जयकार करते रहे, उन्हें बस जयकारा लगाने लायक ही समझा गया। क्या त्याग, सेवा और समर्पण की बीजेपी में कोई कीमत नहीं? क्या इसी के दम पर बीजेपी बार-बार खुद को पार्टी विद डिफरेंस कहती है? नेता पहले भी अपनी पार्टी बदलते रहे हैं, इससे मुझे क्या किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन चुनाव के मौसम में, जब पार्टी भी मान रही हो कि बीजेपी की लहर है, जनता कांग्रेसनीत सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए बेचैन है, तो इन दलबदलुओं को अपने कार्यकर्ताओं के उपर लाद देना कहीं न कहीं ये दिखा देता है कि आप कमजोर हैं। यह कौन सी लहर है जो आपको अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं की क्षमता पर भी विश्वास नहीं करने देती कि वे भी चुनाव जीत सकते हैं। इन नेताओं को यदि पार्टी की विचारधारा में इतना ही भरोसा था, तो अभी क्यों आए? पाल अगर साल-दो साल पहले कांग्रेस छोड़कर आते, कहते कि सरकार के घोटालों और जनता के प्रति सरकार की उपेक्षा देखकर वे बीजेपी में आए, तो उनका सेवाभाव समझ में आता। पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन पाल के ही शब्दों में कांग्रेस ने उन्हें उनका हक नहीं दिया, उनसे जूनियर लोगों को मंत्री बनाया गया, इसकी तकलीफ उनको थी और इसीलिए उन्होंने पार्टी छोड़ दी। और बीजेपी ने भी उनको हाथों-हाथ लिया और टिकट थमा दिया, कमाल है न!
हरियाणा, पंजाब, यूपी और बिहार..
इन सारे राज्यों में इतने पैराट्रूपर्स को बीजेपी ने टिकट दिया है, कि आम जनता और कार्यकर्ता समझ ही नहीं पा रहे हैं कि अब क्या करें। इन्हीं के अत्याचार और उपेक्षा से तो तंग होकर उन्होंने कांग्रसनीत सरकार को उखाड़ फेंकने का निश्चय किया था, अब फिर यही लोग, उस पार्टी की तरफ से आ गए हैं, जिसे जनता विकल्प समझ रही थी। निश्चित रूप से बीजेपी की लहर देश में थी, अभी भी है। बीजेपी के नेता जैसा कि दावा करते रहे हैं, यह लहर सुनामी तो बनेगी जरूर, पर इसमें बीजेपी डूबेगी या कांग्रेस, अब यह देखने वाली बात होगी। और जहां तक मेरी बात है, मुझे तो लग रहा है कि मोदी के अश्वमेघ के घोड़े को उन्हीं की पार्टी के कुछ नेता रोकन में लगे हैं। फिलहाल आप इस चुनावी सीजन का मजा लीजिए, और वोट जरूर दीजिएगा, क्योंकि वही आपकी असली ताकत है।
गांधीनगर से लड़ें वरना घर बैठें
गांधीनगर के बजाय भोपाल से लड़ने को लेकर अड़े लालकृष्ण आडवाणी को बीजेपी के कई बड़े नेता मनाने में लगे हैं। पार्टी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी खुद आडवाणी के घर पहुंचे और करीब एक घंटे तक वहां रहे। मोदी के निकलने के बाद सुषमा स्वराज भी आडवाणी के घर पहुंचीं। वह वहां मौजूद थीं, इसी दौरान वेंकैया नायडू भी वहां पहुंचे और उनके बाद अरुण जेटली ने आडवाणी को मनाने की कोशिश की। शाम को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के दिल्ली पहुंचने के बाद इस विवाद के पटाक्षेप होने की उम्मीद है। इस बीच संघ ने साफ 'संदेश' दे दिया था कि अगर आडवाणी पार्टी द्वारा तय की गई सीट पर नहीं लड़ना चाहते हैं, तो रहने दें। पार्टी नेतृत्व और संघ के रुख को देखते हुए भोपाल में आनन-फानन में वे होर्डिंग्स हटा लिए गए जो वहां आडवाणी की दावेदारी का स्वागत करते हुए लगाए गए थे। अंग्रेजी अखबार टेलिग्राफ के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आडवाणी को सख्त चेतावनी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक संघ ने कहा है, 'सभी नेताओं को बीजेपी संसदीय बोर्ड का फैसला मानना चाहिए। लड़ना है तो गांधीनगर से लड़ें वरना घर बैठें।'इससे पहले मोदी ने संकट को सुलझाने के लिए बुधवार की रात संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की थी, जबकि सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी ने भी आडवाणी से मुलाकात की थी। बाद में गडकरी और सुषमा पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मिलने पहुंचे। मोदी से तनावपूर्ण संबंध के अलावा आडवाणी की नाराजगी के कई कारण बताए जा रहें हैं। आडवाणी के कट्टर समर्थक और अहमदाबाद (पूर्व) से मौजूदा सांसद हरिन पाठक के टिकट कटने की चर्चा है। इसके अलावा जसवंत सिंह को भी अभी तक टिकट नहीं मिला है। वह बाड़मेर से चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन बताया जाता है कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे उन्हें लड़ाने के पक्ष में नहीं हैं। भोपाल से लड़ने के दांव को आडवाणी की अपने नजदीकियों को टिकट दिलाने के लिए मोदी पर दबाव की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि हरिन पाठक को अहमदाबाद (पूर्व) से टिकट देने की घोषणा अब हो जाएगी। सूत्रों के मुताबिक, कुछ ही दिन पहले अपने संसदीय क्षेत्र गांधीनगर से ही चुनाव लड़ने की सार्वजनिक इच्छा जता चुके आडवाणी अब शायद इससे खफा है कि उनकी सीट घोषित होने में देर क्यों लगी, जबकि पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं को लेकर संशय पहले ही खत्म हो गया था। सूत्रों के मुताबिक पहली चार लिस्टों में भी नाम की घोषणा न होने से वह आहत थे। इसी बीच भोपाल से उनको लड़ने का अनुरोध आया और यह बढ़ता गया, तो पार्टी के गलियारों में आडवाणी समर्थकों ने पूछ लिया कि जब सब अपनी पसंद की सीट पर लड़ रहे हैं, तो वह अपनी पसंद की भोपाल सीट पर क्यों नहीं लड़ सकते? इशारा मोदी की पसंद की वाराणसी, राजनाथ सिंह की पसंद की लखनऊ और ऐसी ही अन्य सीटों और नेताओं की तरफ था। सूत्रों ने बताया कि आडवाणी को इस बात का भी कष्ट है कि गुजरात बीजेपी यूनिट ने उनका विरोध किया था, लेकिन मुख्यमंत्री मोदी के हस्तक्षेप के बाद प्रदेश समिति ने गांधीनगर से उनके नाम की सिफारिश की। गुजरात में आडवाणी के करीबी एक बीजेपी लीडर ने कहा कि उनको अहसास है कि गुजरात में पार्टी काडर उन्हें हो सकता है कि पूरा सपॉर्ट न दे। 2009 के कैंपेन में भी उन्हें ज्यादा सपोर्ट नहीं मिला था। बीजेपी लीडर ने कहा कि इसे देखते हुए आडवाणी ने मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान का न्योता स्वीकार करने का फैसला किया था। बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति के एक सदस्य ने बताया कि मोदी बैठक में कहते रहे कि आडवाणी को किसी भी कीमत पर गांधीनगर से लड़ने के लिए मनाया जाना चाहिए। दरअसल, गुजरात से उनके चले जाने से मोदी पर बुरा असर पड़ा होता। इससे विरोधियों को पूरे कैंपेन के दौरान निशाना साधने के लिए हथियार मिल जाएगा कि मोदी पार्टी के सबसे सीनियर लीडर को अपने राज्य में जगह नहीं दे सके। दूसरा डर यह था कि आडवाणी अगर भोपाल से चुनाव लड़ते हैं तो कहीं गुजरात के विकास की तुलना वह फिर से मध्य प्रदेश से न कर दें।

बाबूलाल गौर फिर जगी आस

भोपाल। गुजरात की स्थानीय इकाई ने गांधीनगर और अहमदाबाद ईस्ट से लालकृष्ण आडवाणी को प्रत्याशी बनाने की मांग उठाई थी। बुधवार को नई दिल्ली में दिनभर चले मंथन के बाद आडवाणी को गांधीनगर से टिकट दिया गया है। हालांकि आडवाणी भोपाल को लेकर अड़े हुए हैं। वे बदलते राजनीतिक परिदृश्य से आहत हैंं। कृष्ण भयभीत हैं कि इस राजनीतिक महाभारत में उन्हें पराजित कराने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। लिहाजा उन्होंने अपनी परंपरागत सीट गांधीनगर को छोड़कर राजा भोज की नगरी और शिव-राज के प्रभावशाली क्षेत्र भोपाल से चुनाव लडऩा मुनासिब समझा, लेकिन ऐसा फिलहाल संभव नहीं हो पाया। भोपाल से बाबूलाल गौर अपनी बहू कृष्णा गौर के लिए टिकट मांग रहे हैं। उनका कहना है कि, उन्हें पार्टी ने आश्वस्त किया है कि टिकट उनकी बहू को ही मिलेगा। हालांकि बाद में गौर ने बयान दिया है कि अगर भोपाल से आडवाणी चुनाव लड़े, तो वे कृष्णा गौर का नाम वापस ले लेंगे। उधर, जिला भाजपा अध्यक्ष आलोक शर्मा भी टिकट की आस लगाए बैठे थे। मोदी ने आडवाणी को खुद फोन करके गांधीनगर से ही चुनाव लडऩे का आग्रह किया था, लेकिन वे मौन रहे! ऐसा कहा जा रहा है कि आडवाणी के इस फैसले से मोदी भी आहत हुए थे। हालांकि आडवाणी को भोपाल से चुनाव लडऩे के लिए पहले से ही न्यौता दिया जा चुका था।
तो क्या फिर से कैलाश जोशी
यह लोकसभा चुनाव देश ही नहीं; मप्र की राजनीति में भी एक नया अध्याय लिखने जा रहा है। मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भोपाल से दो बार के सांसद कैलाश जोशी इस बार भी टिकट की आस में थे, लेकिन आडवाणी के लिए उन्हें राजनीतिक संन्यास पर विवश कर दिया गया। अब जबकि आडवाणी की भोपाल से चुनाव लडऩे की इच्छा अधूरी-सी दिखाई पड़ रही है, स्थानीय नेतृत्व द्वारा जोशी को फिर से मनाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। गुरुवार को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साथ आधे घंटे चर्चा की। ऐसा माना जा रहा है कि यदि आडवाणी को मना लिया गया, तो कैलाश जोशी को भोपाल से टिकट दिया जा सकता है।
आडवाणी के आने से मप्र भाजपा को नफा-नुकसान
भाजपा के नेताओं की मानें, तो यदि आडवाणी मप्र से अपनी राजनीति करते, तो यहां भाजपा के स्थानीय नेतृत्व में बड़ा बदलाव आता। इससे नफा-नुकसान दोनों होते। फायदा यह होता कि, मप्र का केंद्र की राजनीति में खासा दखल बढ़ जाता। वहीं नुकसान यह होता कि, मप्र से दो बड़े नेता होने यानी सुषमा स्वराज(विदिशा से उम्मीदवार और वर्तमान सांसद) और दूसरे आडवाणी, ऐसे में स्थानीय नेतृत्व को उतनी तवज्जो नहीं मिलती।
महाकुंभ से चल रहे मनाने के प्रयास...
25 सितंबर, 2013 को भोपाल में भाजपा ने राजनीतिक महाकुंभ का आयोजन किया था। इस आयोजन में लाखों कार्यकर्ताओं के बीच भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मौजूद था। राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी। नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार तय किया जा चुका था, इसलिए आडवाणी रूखे मन से कार्यक्रम में पहुंचे। यहां भी मोदी ने आडवाणी के पैर छूकर उन्हें मनाने का प्रयास किया था। दरअसल, आडवाणी को उम्मीद थी कि अगर भाजपा की सरकार बनी, तो प्रधानमंत्री उन्हें ही बनाया जाएगा, लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा संभव होता नजर नहीं आया। अब फिर से आडवाणी को मनाने के प्रयास हो रहे हैं।

मंगलवार, 18 मार्च 2014

अपनों से जासूसी करा रहे राहुल-मोदी

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और भाजपा की ओर से पीएम पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी सिर्फ अपनी-अपनी पार्टी के फीडबैक से संतुष्ट नहीं होते। जमीनी स्थिति का पता करने के लिए उन लोगों ने अपने "जासूस" छोड़ रखे हैं। यह दरअसल क्रॉसचेक करने और समस्या गंभीर होने से पहले ही उसका समाधान करने के लिए है।
मोदी हमेशा एडवांस
इसमें मोदी आगे चलते हैं। अभी दिसंबर में जब सभी लोग पांच राज्यों के विस चुनावों के परिणाम की बाट जोह रहे थे, मोदी की टीम मप्र, छग़, राजस्थान समेत विभिन्न राज्यों में लोस चुनाव को लेकर आकलन करने में लगी थी। इसमें भाजपा नेतृत्व या संगठन की भूमिका नहीं थी। बल्कि पार्टी ने संभावित प्रत्याशियों और जमीनी स्थिति वगैरह को लेकर सर्वेक्षण वगैरह बाद में शुरू किए। इसी कारण माना जाता है, मोदी एडवांस चलते हैं। मोदी अपने जुटाए आंकड़ों को पार्टी की तरफ से आए फीडबैक से मिलाते जरूर हैं। उनकी टीम इस आधार पर ही कोई रिपोर्ट उनके सामने पेश करती है। माना जाता है पिछले साल हुए विस चुनावों की रणनीति में इस आधार पर कई बदलाव हुए और शायद एक कारण है कि भाजपा के हक में नतीजे अनुमान से कहीं बेहतर रहे।
मोदी ठकुरसुहाती या चेहरा देखकर मनमाफिक बात करने वालों से बचकर रहते हैं। वे जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ प्रोफेशनल्स से भी यह काम कराते हैं। कई बार तो यह होता है सर्वेक्षण करने वाले को पता नहीं होता वह किस व्यक्ति के लिए काम कर रहा क्योंकि यह मार्केटिंग सर्वे एजेंसियों के जरिये भी कराया जाता है। मतलब यह संभवतः आपके यहां टूथपेस्ट या वाशिंग मशीन को लेकर सर्वे करने आया व्यक्ति कई तरह के सवाल पूछे और इसमें से कुछ डाटा का उपयोग मोदी की टीम करे।
राहुल भी...लेकिन यह परेशानी
राहुल भी यह रास्ता अख्तियार तो करते हैं, लेकिन दिक्कत है, राहुल के लिए सर्वेक्षण या अध्ययन करने वाले लोगों में अधिकतर कांग्रेस से जुड़े लोग रहते हैं और वे पहचान छिपाने या गुपचुप जुटाने में पिछड़ जाते हैं। राहुल जिन लोगों को इस तरह का काम असाइन करते हैं, वे लोग सीधे उन्हें ही रिपोर्ट करते हैं। इनकी रिपोर्ट के आधार पर टिकट भी तय होते हैं।