शुक्रवार, 14 मार्च 2014

यूथ के लिए फोकस किया सोशल साइट्स पर

इस बार के लोकसभा इलेक्शन में वोट डालने को लेकर दस करोड़ से ज्यादा एफटीवी यानी फर्स्ट टाइम वोटर्स उत्साहित हैं। इनमें ज्यादातर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर एक्टिव है। कई यूजर तो फेसबुक और ट्विटर पर पॉलिटिकल बातें और आपस में डिबेट भी कर रहे हैं। बहुत से वोटर्स ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन में पॉलिटिक्स से रिलेटेड मैटर पोस्ट कर रखे हैं। जिस तरह सोशल मीडिया पर पॉलिटिकल पार्टियों की एक्टिविटीज दिखाई दे रही है, उससे साफ है कि चुनावों में इसका खासा उपयोग होने वाला है। पार्टियां अपनी योजनाओं की जानकारी देने के साथ ही अन्य पार्टियों पर हमला करने के लिए सोशल साइट्स को प्लेटफॉर्म बना चुकी हैं। इससे साफ है कि इस चुनाव में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का प्रभाव देखने को मिलेगा। सभी पार्टियों के आईटी सेल मध्यप्रदेश में सोशल मीडिया पर नजर रखने और समय-समय पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए दोनों बड़ी पार्टियों भारतीय जनता पार्टी और कांग्र्रेस खूब मेहनत कर रही है। इसके लिए भोपाल में अलग से आईटी सेल बनाए गए हैं, जिसमें बैठे कई टेक्निकल एक्सपर्ट सोशल साइट्स पर चल रही बातों पर ध्यान लगाए हुए हैं। जरूरत पड़ने पर हाथो-हाथ अपने व्यू भी रख रहे हैं। यहीं नहीं फेसबुक और वॉट्सएप पर कई ऐसे गु्रप बना लिए गए हैं, जिससे हजारों लोगों को जोड़ा जा रहा है। फेसबुक पर कई तरह की ऐसी सामग्री पोस्ट की जा रही है, जिससे हर वर्ग के यूजर का ध्यान जा रहा है। फेसबुक पेज पर सभी पार्टियां अपने मुद्दे भुनाने के लिए अन्य पार्टियों पर सोशल वार भी कर रही है, जिसका जवाब देने के लिए कांग्रेस पार्टी ने तो कांग्रेस एमपी वार रूम मीडिया नाम से बनाकर रखा है। यूथ वोटर पर ही ध्यान सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर यूथ की संख्या ज्यादा है, इसलिए सभी पार्टियां इन्हें अपने गु्रप और पेज से जोड़ने के लिए कई तरह के प्रयास कर ही है। सभी अपने पेज पर ज्यादा लोगों की संख्या दिखाना चाहते हैं इसलिए कई यूजर को पेज से जुड़ने के लिए आगे बढ़कर निमंत्रण दिया जा रहा है। दलों ने अपने छात्र संगठनों के नेताओं को भी कहा है कि ज्यादा से ज्यादा स्टूडेंट्स को पार्टी के सोशल नेटवर्किंग साइट्स से जोड़े। हालांकि कई यूजर पॉलिटिक्स पेज पर इसलिए जुड़ना नहीं चाहते है, क्योंकि बार-बार की पोस्ट से वे डिस्टर्ब होते हैं। नोटिफिकेशन को देखने में उनका समय खराब होता है। सांसद के फेसबुक पर जगह नहीं पार्टियों में कई नेता ऐसे है, जिनकी फेसबुक प्रोफाइल में फ्रेंड्स की संख्या हजारों में पहुंच गई है। एक लिमिट के बाद यूजर फ्रेंड रिसिव नहीं कर सकते। इंदौर की सांसद सुमित्रा महाजन की फेसबुक प्रोफाइल पर यूजर को जोड़ने की लिमिट खत्म हो गई हैं। ताई के नाम से फेसबुक पर एक पेज भी बना है, लेकिन इससे जुड़ने वाले यूजर की संख्या मात्र 481 है। इनकी पोस्ट पर वार कांग्रेस की ओर से इस बार के लोकसभा उम्मीदवार सत्यनारायण पटेल की फेसबुक प्रोफाइल पर भी 4769 यूजर जुड़े है। एक तरह से इनके अकाउंट में भी नए यूजर जुड़ने के चांस कम ही है। इनके प्रोफाइल सामने वाली पार्टी के उम्मीदवार पर वार करने वाली पोस्ट भी दिखाई दे रही है। सत्यनारायण पटेल के नाम से फेसबुक पर एक पेज भी बना हुआ है। ये खासकर लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए बनाया गया है। इस पेज को 972 यूजर ने लाइक किया है। सोशल मीडिया में चुनाव इस बार लोकसभा इलेक्शन में 80 करोड़ से ज्यादा वोटर्स हैं। खास बात यह है कि पहली बार वोट का अधिकार प्राप्त करने वालों की संख्या 10 करोड़ से अधिक है। देश में 9 करोड़ से कहीं ज्यादा लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं। ऐसे में एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ये 9 करोड़ लोग इस इलेक्शन में बड़ा रोल निभा सकते हैं। सर्वे के अनुसार, एक तिहाई से ज्यादा सोशल मीडिया यूजर्स 5 लाख से कम पॉपुलेशन वाली सिटीज में रहते हैं, जबकि 25 परसेंट से ज्यादा सोशल मीडिया यूजर्स 2 लाख से कम पॉपुलेशन वाले शहरों के हैं। ऐसा माना जा रहा है कि सोशल मीडिया पर एक्टिव यूजर्स न केवल खुद बड़ी भूमिका निभाएंगे, बल्कि वे अपने आसपास के वोटरों को भी प्रभावित कर सकते हैं। - सोशल मीडिया पर साथियों, दोस्तों की सिफारिशें काफी प्रभावित होती हैं। ह्यश्रष्द्बड्डद्यठ्ठश्रद्वद्बष्ह्य.ठ्ठह्ल के मुताबिक, 90 फीसद कंज्यूमर इन पर भरोसा करते हैं। ये सिफारिशें वोटर्स के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं। - एक्सपर्ट के अनुसार एक सोशल साइट्स यूजर अपने घर में कम से कम तीन लोगों को प्रभावित कर सकता है। एक स्टडी के अनुसार 2009 लोकसभा इलेक्शन में कांग्रेस के खाते में गई 75 सीटें ऐसी हैं, जिनका फ्यूचर सोशल मीडिया के असर से अछूता नहीं रह सकता। इसी प्रकार से बीजेपी के कब्जे वाली 44 सीटें सोशल मीडिया की मुट्ठी में हैं। यह भी माना जा रहा है कि इलेक्शन से ठीक 48 घंटे पहले जब चुनाव प्रचार पर रोक लग जाएगी, तब सोशल मीडिया बड़ी भूमिका निभाएगा। यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा ने सोशल मीडिया के लिए भारी-भरकम टीम जुटा रखी है। भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी खुद ट्विटर पर एक्टिव हैं और करीब 9 भाषाओं में ट्वीट करते हैं। इतना ही नहीं, मोदी ने बेंगलुरु से आईटी के एक्सपर्ट अपनी टीम में बुलाए हैं, जिन्हें लाखों का पैकेज दिया जा रहा है। एक्सपर्ट्स के अनुसार सोशल साइट्स पर एक्टिव यूथ और वोटर्स को ध्यान में रखकर आजकल ज्यादातर पॉलिटिकल पार्टीज सोशल साइट्स के जरिए लोगों से जुड़ने का प्रयास कर रही हैं, वहीं वोटर्स भी पॉलिटिक्स और इलेक्शंस से अपडेट रहने के लिए डिजिटल वर्ल्ड का ज्यादा सहारा ले रहे हैं। फेसबुक का असर 2014 लोकसभा इलेक्शन में टोटल 543 सीटों में से कम से कम 160 का फ्यूचर सोशल मीडिया से तय होगा। आईआरआईएस ज्ञान फाउंडेशन और इंडियन इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन द्वारा कराई गई इस स्टडी की मानें तो सोशल मीडिया के जरिए सीटों पर सबसे ज्यादा महाराष्ट्र की पॉलिटिक्स में पड़ेगा। महाराष्ट्र की 21 लोकसभा सीटें सोशल मीडिया के प्रभाव में हैं, जबकि गुजरात की 17, उत्तर प्रदेश में 14, कर्नाटक में 12, तमिलनाडु में 12, आंध्र प्रदेश में 11, केरल में 10 और एमपी की 9 सीट पर सोशल मीडिया फैक्टर असर दिखा सकता है। इस स्टडी में 67 सीटों की अत्यधिक प्रभाव वाली, जबकि शेष सीटों की कम प्रभाव वाली सीटों के रूप में पहचान की गई है। सबसे अधिक प्रभाव वाली सीट से आशय उन सीटों से है, जहां पिछले लोकसभा इलेक्शन में विजयी उम्मीदवार के जीत क ा अंतर फे सबुक क ा प्रयोग करने वालों से कम है या जिन सीटों पर फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल वोटर्स की संख्या का 10 फीसद है। एक स्टडी यह भी सोशल बिजनेस इंटेलिजेंस कंपनी सिंप्लीफाई 360 का दावा है कि इंडिया में 24 फीसद वोटर्स सोशल मीडिया पर हैं। भारत में 31 फीसद ट्विटर यूजर्स ने माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट पर पॉलिटिकल पर ट्वीट पढ़ा है। 2009 में कांग्रेस को कुल पड़े मतों में से 28.6 फीसद वोट मिले थे। ऐसे में 24 फीसद वोटर्स की सोशल मीडिया पर मौजूदगी आने वाले लोकसभा चुनाव में पासा पलटने के लिए काफी है। लोकसभा चुनाव तैयारी के लिए पार्टी का आईटी सेल काम कर रहा है। यह हर पल सोशल साइट्स पर होने वाली एक्टिविटीज को देख रहा है और समय-समय पर पार्टी की ओर से जानकारी या बयान जारी कर रहा ह। अन्य पार्टियों द्वारा लगाए जाने वाले इल्जाम का जवाब भी हाथो-हाथ दिया जा रहा है। - नरेंद्र सलूजा, प्रवक्ता, मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी पार्टी का खुद का आईटी सेल सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर एक्टिव है। जरूरत पड़ने पर कई तरह की जानकारी डाली जा रही है, जिससे वोटर सहीं फैसला ले सके। अन्य पार्टी को जवाब देने के लिए आईटी सेल तैयार रहता है। - अलोक दुबे, संभागीय प्रवक्ता, मध्यप्रदेश भाजपा

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

प्रभात झा की पॉलिटिक्स पर भारी शिवराज की सियासत

विनोद उपाध्याय मध्य प्रदेश में लगातार शिवराज सिंह के लिए संकट बनते जा रहे प्रभात झा को काबू में करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ऐसा दांव चला है कि प्रभात झा चारो खाने चित्त हो सकते हैं। शिवराज सिंह चौहान ने अनूप मिश्रा का कद पद बढ़ाकर प्रभात झा को तगड़ा झटका दिया है। अपनी शतरंजी चालों के सहारे अच्छे-अच्छों को राजनीति के बियावान में धकेलकर मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देखने वाले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बिहारी बाबू प्रभात झा को मुख्यमंत्री ने ऐसी मात दी है कि अब झा साहब बगले झांकते फिर रहे हैं। दरअसल, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ग्वालियर चंबल के दबंग नेता अनूप मिश्रा की मंत्रिमंडल में वापसी कर एक तीर से कई निशाने साधे। मुख्यमंत्री ने अनूप मिश्रा को मंत्री पद की शपथ दिलाकर मध्यप्रदेश में प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा के बढ़ते आभामंडल पर 'ब्रेकÓ लगाने का प्रयास किया है। राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि यह कदम श्री चौहान ने पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर की मंत्रणा पर उठाया। दो साल,दो महीने के अंतराल के बाद अनूप मिश्रा फिर से प्रदेश सरकार में मंत्री की कुर्सी पर हैं। उनके मंत्री बनते ही प्रदेश में भाजपा की राजनीति में समीकरण बदलेंगे, इसकी सुगबुगाहट तेज हो गई है। इन समीकरणों के चलते उन लोगों को खासी परेशानी हो सकती है, जो मिश्रा के सत्ता से बाहर रहते हुए उनसे किनारा कर गए थे। इनमें प्रभात झा पहले नंबर पर हैं। प्रदेश भाजपा की कमान संभालने के बाद ही झा की फ्रेमिंग शिवराज के विकल्प के तौर पर की जाने लगी। प्रभात झा की शिवराज मंत्रीमण्डल में बढ़ते दखल और प्रभाव से इन सियासी हवाओं को हकीकत की जमीन भी मिलती गई। मध्यप्रदेश भाजपा के मीडिया प्रभारी के बाद सीधे प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बनकर लौटे प्रभात झा ने जब प्रदेशाध्यक्ष की जवाबदारी संभाली तभी ये तय हो गया था कि झा अब हिसाब किताब बराबर करेंगे। पार्टी के भीतर उनके सियासी दुश्मनों की मुश्किलें अब बढऩे वाली हैं। झा के मोर्चा संभालते ही, पहली गाज अनूप मिश्रा पर गिरी। और इस तरह गिरी की उनकी पूरी राजनीति ही संकट में आ गई। दुश्मन खैर मना ही रहे थे, कि दूसरी गाज में रघुनंदन शर्मा को पार्टी के उपाध्यक्ष पद से हाथ धोना पड़ गया। प्रदेश भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र तोमर को भी झा ने बड़ी चतुराई से निपटा दिया। पार्टी के एक नेता कहते हैं कि झा को इस बात का अभास होने लगा था कि उनके बढ़ते प्रभाव की राह में नरेन्द्र सिंह तोमर कंटक बन सकते हैं। इसलिए कि तोमर को मुख्यमंत्री के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाने लगा था। झा ने उन्हें दिल्ली पहुंचाकर रास्ते से हटा दिया। तोमर को बाद में एहसास हुआ कि उनका कद सिर्फ देखने के लिए बढ़ा है। सच्चाई यह है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनने की राह से अलग किया गया है। नरेन्द्र सिंह तोमर के राष्ट्रीय महासचिव बनने से उनके समर्थकों में अब पहले जैसा उत्साह नहीं है। उन्होंने अपने समर्थकों से यहां तक कह दिया कि अभी मेरे बुरे दिन चल रहे हैं, पार्टी में जिस भी बड़े नेता से जुड़ सकते हो जुड़ जाओ। वक्त आने पर लौट आना। उसके बाद यह सिलसिला ऐसा चला की अभी तक थमता नजर नहीं आ रहा है। मप्र सरकार के एक मंत्री कहते हैं कि प्रभात जी मंत्रियों में आपस में तालमेल बनाए रखने की जगह भिड़ाने का काम करते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि ऐसा करने से पार्टी में गतिशीलता बनी रहेगी और भाजपा हमेशा सुर्खियों में रहेगी। भाजपाई भी स्वीकारते हैं कि मंत्रियों के साथ प्रदेश अध्यक्ष का तालमेल बहुत कम है। झा के प्रभाव का ही असर है कि पूर्व मंत्री कमल पटेल भी खाली घूम रहे हैं। पार्टी में उनकी हैसियत शून्य कर दी गई है। कमल पटेल को उम्मीद थी कि हत्या के एक मामले में सीबीआई के घेरे से निकलने के बाद उनका सरकार में रुतबा बढ़ जाएगा लेकिन प्रभात के कारण वह आज भी हासिए पर हैं। भाजपा की राजनीति को नजदीक से समझने वालों की माने तो प्रभात का अगला शिकार स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे। यही कारण है कि कुक्षी, सोनकच्छ, जबेरा और महेश्वर उपचुनाव में भाजपा को मिली जीत को अपनी मेहनत का परिणाम दर्शाने के लिए झा ने ऐसी गोंटियां बिछाई की काम और नाम शिवराज का, लेकिन इस जीत का सेहरा प्रभात झा के सिर पर बंधा। इसका प्रचार करने के लिए प्रभात झा ने प्रदेश में कई सभा और बैठके कर अपना गुणगान कराया। लेकिन जब मुख्यमंत्री विकास यात्रा पर निकले तो हकीकत सामने आ गई। भाजपा के संत और पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी,पूर्व सांसद कैलाश सारंग और सांसद अनिल माधव दवे अपने बहिष्कार से दुखी हैं। अनिल माधव दवे को इंदौर में हुई राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष के सामने प्रजेंटेशन के जरिए काबिलियत दिखाना उन्हें भारी पड़ा। भाजपा संगठन और सरकार उन्हें नजरअंदाज कर रहे हैं। स्वयंसेवी संगठनों के सम्मेलन में उन्हें बोलने नहीं दिया। उल्लेखनीय है की उपरोक्त सभी नेता मुख्यमंत्री के शुभचितकों में गिने जाते हैं। पार्टी के अंदर गुस्सा कइयों में खौल रहा है। कोई खुल कर विरोध इसलिए नहीं करना चाह रहा है कि अगले साल चुनाव होना है। कहीं पार्टी से अलग न कर दिया जाए। ऐसी स्थिति में चुनाव लडऩा मुश्किल हो जाएगा। उमा भारती का हश्र देख चुके हैं। विकास यात्रा के जरिये भाजपा नेतृत्व प्रदेश की जनता की नब्ज टटोलने निकली थी कि उसकी स्थिति जनता के बीच कैसी है। लेकिन आम जनता के बीच सरकार की स्थिति बदतर और प्रभात झा के प्रति पार्टी पदाधिकारियों तथा कार्यकर्ताओं का बढ़ता रूझान देखकर शिवराज चौकना हो गए। उसके बाद मुख्यमंत्री को एक गोपनीय रिपोर्ट उनके शुभचिंतकों ने सौंपी। रिपोर्ट में हुए खुलासे ने मुख्यमंत्री को चौंकाया। इस रिपोर्ट से बताया गया कि प्रदेश के अधिकांश विधायक प्रभात झा के पाले में जा रह हैं। वहीं प्रभात झा ने प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए जिन जिन नेताओं को किनारे लगाया, वो सब के सब प्रभात झा से अपनी नजदीकी बढ़ा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ग्वालियर में देखने को मिला जब पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा अपनी सरकार में पूछ-परख नहीं होने से आहत होकर ग्वालियर में दरबार लगाकर नगर निगम कमिश्नर और अधिकारियों की जमकर क्लास ली थी। तब प्रभात झा ने जाकर उनको समझाया तो वह मान गए। उसके बाद इन दोनों में आपसी घनिष्ठता बढऩे लगी। मौके की नजाकत को देखते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने अपने दोस्त और पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर से सलाह लिया। तोमर ने प्रभात के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए मंत्रिमंडल विस्तार की योजना बनाई और अनूप मिश्रा को सम्मान मंत्री पद सौंपा। अब गेंद शिवराज के हाथ में है। देखना यह है कि वह प्रभात को बोल्ड करने के लिए किसको गेंद थमाते हैं।

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

ईमानदार होने की सजा



ईमानदार होने की कीमत जब-तब देश और समाज को चुकानी ही पड़ती है। एक बार फिर एक आइपीएस अधिकारी को अपनी जान देकर ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ी है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में पुलिस अनुमंडल अधिकारी यानी एसडीपीओ के पद पर तैनात 2009 बैच के आइपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार सिंह को बामौर में अवैध खनन से जुड़े माफियाओं ने मार डाला। बताया जा रहा है कि उन्होंने बामौर में जाकर अवैध खनन को रोकने की हिम्मत दिखाई तो ट्रैक्टर चालक गाड़ी लेकर भागने लगा। जब उन्होंने ट्रैक्टर चालक को बीच रास्ते में रोकने की कोशिश की तो उसने नरेंद्र कुमार पर ट्रैक्टर चढ़ा दिया। अस्पताल में नरेंद्र की मौत हो गई। यह हृदयविदारक घटना इस बात की तस्दीक करती है कि देश में अवैध खनन से जुड़े माफिया की ताकत चरम पर है और सरकारें उनके आगे लाचार और पंगु हैं। यह घटना चाक-चौबंद कानून-व्यवस्था की मुनादी पीटने वाली मध्य प्रदेश सरकार के माथे पर कलंक है। अभी तक मध्य प्रदेश में काली कमाई करने वालों का ही भंडाफोड़ हो रहा था, लेकिन आइपीएस अधिकारी की हत्या ने राज्य की डांवाडोल होती कानून-व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। राज्य सरकार ने हत्याकांड की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं, लेकिन विपक्ष सीबीआइ जांच की मांग पर अड़ा हुआ है। सरकार दावा कर रही है कि वह खनन माफिया के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेगी और अवैध खनन के खेल पर रोक लगाएगी, लेकिन सरकार के दावे पर यकीन करना कठिन है। इसलिए कि खनन माफिया के खिलाफ कार्रवाई की मांग लंबे अरसे से की जा रही है, लेकिन सरकार हाथ पर हाथ धरी बैठी है। इसी का दुष्परिणाम है कि आज खनन माफिया के हौसले बुलंद हैं और ईमानदार लोग मारे जा रहे हैं, लेकिन त्रासदी का यह खेल मध्य प्रदेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अन्य राज्यों में भी अवैध खनन का काला कारोबार जारी है और संबंधित राज्य सरकारों ने मौन धारण किया हुआ है। राजनीतिक संरक्षण दरअसल, अवैध खनन के इस खेल में वही लोग शामिल हैं, जिनके पांव सत्ता के गलियारे तक जाते हैं। अमूमन अवैध खनन के खेल में सत्ता से जुड़े मंत्रियों, सांसदों और विधायकों का नाम सुना जाता है। कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं की कारस्तानी जगजाहिर है। कर्नाटक सरकार पर उन्हें संरक्षण देने का आरोप भी लगता रहा है। मतलब साफ है, अवैध खनन से जुड़े माफियाओं को न केवल सत्ता का संरक्षण प्राप्त है, बल्कि सत्ता में उनकी सीधी भागीदारी है। अन्यथा, क्या मजाल कि अवैध खनन से जुड़े माफिया दिन-दहाड़े एक आइपीएस अधिकारी को ट्रैक्टर से कुचलकर मार डालते और सरकार शोक व्यक्त करती रह जाती। इस तरह की घटनाएं आए दिन मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से सुनने को मिलती रहती हैं। खनन माफिया द्वारा सरकारी मुलाजिमों, आमजन और आरटीआइ कार्यकर्ताओं की हत्या आम बात हो गई है। अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में पहाड़ धंसने से दर्जनों लोगों की जानें चली गई। इस घटना के लिए भी कसूरवार खनन माफिया ही बताए जा रहे हैं। सोनभद्र की यह घटना भी सत्ता पोषित भ्रष्टाचार का ही नतीजा है। हजारों एकड़ सुरक्षित वन भूमि को दुस्साहसिक ढंग से उत्तर प्रदेश सरकार की भूमि घोषित कर उसे मनचाहे पट्टेदारों को अलॉट कर दिया गया है और उस पर अवैध खनन जोरों पर है। दुर्भाग्य यह है कि दर्जनों लोगों के मारे जाने के बाद अब भी खनन का खेल जारी है। हाल ही में कर्नाटक में एक खनन माफिया के समर्थकों ने पत्रकारों पर हमला बोल दिया। दरअसल, ये हमले उन लोगों द्वारा किए और कराए जा रहे हैं, जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। वे नहीं चाहते कि प्रशासन, आमजन, मीडिया या आरटीआइ कार्यकर्ता उनकी काली करतूतों पर से पर्दा हटाएं। व्यवस्था को अराजकता में बदल चुके इन लोगों के लिए सरकारी मुलाजिम और आरटीआइ कार्यकर्ता राह के रोड़े नजर आते हैं। वे उन्हें रास्ते से हटाने के लिए हत्या तक पर उतारू हैं। सच तो यह है कि देश में भ्रष्ट नौकरशाहों, राजनेताओं और स्थानीय स्तर के भ्रष्ट कर्मचारियों, बिल्डरों, भू-खनन माफियाओं का एक ऐसा नेटवर्क तैयार हो गया है, जिसका मकसद अवैध तरीके से अकूत संपदा इक_ा करना है। दुर्भाग्य यह है कि सरकार उनके तंत्र को तोडऩे में नाकाम साबित हो रही है। जब तक इन भ्रष्टमंडलियों को छिन्न-भिन्न नहीं किया जाएगा, खनन माफिया और अराजक किस्म के धंधों से जुड़े लोग सरकारी मुलाजिमों और आरटीआइ कार्यकर्ताओं की हत्या करते रहेंगे। दुर्भाग्य यह है कि खनन माफिया के खिलाफ जो सरकारी अधिकारी-कर्मचारी अभियान छेड़े हुए हैं, उन्हें सरकार सुरक्षा दे पाने में भी असमर्थ है। लिहाजा, उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ रही है। लूट तंत्र के शिकार हुए कई जांबाज याद होगा, महाराष्ट्र में मालेगांव के अपर जिलाधिकारी यशवंत सोनवाने को तेल माफिया ने दिनदहाड़े जिंदा जला दिया था। जब उन्होंने तेल के काले धंधे से जुड़े लोगों को रंगे हाथ पकडऩा चाहा तो मौके पर ही तेल माफिया के गुर्गो ने उन्हें जलाकर मार डाला। राष्ट्रीय राजमार्ग अथॉरिटी (एनएचएआइ) के परियोजना निदेशक सत्येंद्र दुबे की बिहार में गया के निकट गोली मारकर हत्या कर दी गई। सत्येंद्र दुबे अपनी ईमानदारी के लिए विख्यात थे। उन्होंने एनएचएआइ में बरती जा रही अनियमितताओं के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखा था। इसी तरह इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के मार्केटिंग मैनेजर शणमुगम मंजूनाथ को उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में गोली मारकर खत्म कर दिया गया। शणमुगम ने तेल ईधन में मिलावट करने वाले तेल माफिया का पर्दाफाश किया था। इसी तर्ज पर देश में आरटीआइ कार्यकर्ताओं की भी हत्या की जा रही है। आरटीआइ कार्यकर्ता भी निशाने पर महज एक साल के दौरान ही एक दर्जन से अधिक आरटीआइ कार्यकर्ताओं की जानें ली जा चुकी हैं। अहमदाबाद के आरटीआइ कार्यकर्ता अमित जेठवा की इसलिए हत्या कर दी गई कि उन्होंने गीर के जंगलों में अवैध खनन का पर्दाफाश किया था। कई रसूखदार लोगों का चेहरा सामने आना तय था, लेकिन उससे पहले ही जेठवा की जान ले ली गई। हत्यारों ने गुजरात हाईकोर्ट के सामने ही उन्हें गोली मार दी। महाराष्ट्र के दत्ता पाटिल आरटीआइ का इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर किए थे। उनकी कोशिश की बदौलत ही एक भ्रष्ट पुलिस उपाधीक्षक और एक वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। उनकी पहल पर ही नगर निगम के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई थी, लेकिन सच और ईमानदारी की लड़ाई लडऩे की कीमत उन्हें भी जान देकर चुकानी पड़ी। इसी तरह महाराष्ट्र के आरटीआइ कार्यकर्ता वि_ल गीते, अरुण सावंत तथा आंध्र प्रदेश के सोला रंगाराव और बिहार के शशिधर मिश्रा को अपनी जान गंवानी पड़ी। जम्मू-कश्मीर के मुजफ्फर बट, मुंबई के अशोक कुमार शिंदे, अभय पाटिल तथा पर्यावरणवादी सुमेर अब्दुलाली पर भी जानलेवा हमला किया गया। देश के पहले केंद्रीय सूचना आयुक्त रह चुके वजाहत हबीबुल्ला की मानें तो कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमले यह पुख्ता करते हैं कि आरटीआइ एक्ट देश में प्रभावी रूप ले रहा है, लेकिन क्या यह दिल दहलाने वाली बात नहीं है कि इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है? आज मौंजू सवाल यह है कि सरकारी मुलाजिमों और आरटीआइ कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमले कब बंद होंगे? सरकार उन्हें सुरक्षा कब मुहैया कराएगी? सच तो यह है कि सरकार की लापरवाही से ही ईमानदार अधिकारी और आरटीआइ कार्यकर्ताओं की जान सांसत में है। आज जरूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें अवैध खनन रोकने के लिए सख्त कानून बनाएं और उस पर अमल भी करें। अन्यथा, खनन माफिया पर अंकुश लगाना कठिन हो जाएगा और ईमानदार लोगों की जान जाती रहेगी।
युवा और तेजतरार्र आइपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की निर्मम हत्या ने यह साबित कर दिया है कि इस देश में ईमानदार अधिकारियों के लिए काम कर पाना बेहद मुश्किल हो गया है। इसके साथ ही भ्रष्ट और बेईमान लोगों के लिए अपना काला धंधा चलाना कितना आसान है। यह पहली घटना नहीं है, जब किसी ईमानदार पुलिस अधिकारी ने फर्ज की खातिर अपनी जान की बाजी लगाई है। आइपीएस नरेंद्र कुमार की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में खनन माफिया ने वहां तैनात एक एसडीएम और एसडीपीओ पर जानलेवा हमला कर दिया। राज्य में हो रही ऐसी घटनाएं शिवराज सिंह चौहान सरकार की नाकामी जाहिर करने के लिए काफी है। फर्ज की राह में शहीद होने वाले ऐसे ईमानदार और निडर अधिकारियों की फेहरिस्त काफी लंबी है। वर्षो पहले बिहार के सहरसा-खगडिय़ा जिले के दियारा में दस्यु गिरोह का मुकाबला करते हुए डीएसपी सतपाल सिंह ने भी अपनी शहादत दी थी। हालांकि सतपाल सिंह की मौत के बाद यह बात चर्चा में रही कि स्थानीय जिला प्रशासन अगर समय रहते पर्याप्त पुलिस बल मौके पर भेजता तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी। इसके बाद बिहार के बहुचर्चित गोपालगंज के डीएम जी. कृष्णैया हत्याकांड का मामला सामने आया, जिसके नामजद अभियुक्त बाहुबली नेता आनंद मोहन फिलहाल उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। ऐसी ही एक और घटना झारखंड के चतरा जिले में कुछ साल पहले हुई थी, जिसमें वन माफिया और नक्सलियों ने मिलकर एक डीएफओ की निर्मम हत्या कर दी। ईमानदार पुलिस अधिकारियों की हत्या का सिलसिला यही नहीं थमा, बल्कि साल दर साल बीतने पर इसमें और इजाफा हुआ। पिछले साल महाराष्ट्र में तेल माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने पर एक एसडीएम को जिंदा आग के हवाले कर दिया गया। दिनदहाड़े ऐसी घटनाएं होने के बावजूद संबंधित राज्य सरकारें उन लोगों पर कार्रवाई नहीं करती। सरकार की इस अनदेखी की सबसे बड़ी वजह कुछ और नहीं, बल्कि कहीं न कहीं इस काले धंधे में उनके लोगों और नाते-रिश्तेदारों की भागीदारी है। बीते कुछ वर्षो से देश के कई हिस्सों में अवैध खनन का कारोबार बेरोक-टोक चल रहा है। हिंदुस्तान के लगभग उन सभी राज्यों में जहां पहाड़ मौजूद हैं, वहां खनन माफिया सक्रिय हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि धन की इस धार में राजनीतिक दलों के नेता पूरी तरह शामिल हैं या इस तरह कहें कि राज्य सरकारें ऐसे खनन माफियाओं को पूरी तरह अपना संरक्षण दे रही है। कर्नाटक, गोवा में भाजपा और कांग्रेस की सरकार इस मामले में पूरी तरह बेनकाब भी हो चुकी है। आइपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की जिस बेरहमी के साथ हत्या की गई, उससे कई सवाल पैदा हो रहे हैं। जिस मुरैना में उनकी हत्या हुई, उस जिले में अवैध खनन का धंधा कई वर्षो से चल रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कथित सुशासन में यह धंधा थमने की बजाय बढ़ता ही चला गया। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि जिस संसद भवन को देखकर हम उसकी वास्तुकला पर खुशी से इठलाते हैं, असल में उसे बनाने की प्रेरणा मुरैना स्थित मितावली चौंसठ योगिनी मंदिर से ली गई थी। यह मंदिर आठवीं सदी में बनाया गया था। इसे देखने के बाद हर कोई इसे नई दिल्ली स्थित संसद भवन का प्रतिरूप कहे बिना नहीं रह सकता। हालांकि ऊंची पहाडिय़ों पर स्थित इस ऐतिहासिक धरोहर का वजूद अवैध खनन के चलते खतरे में पड़ गया है। इस अवैध खनन में कोई और नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में सरकार चला रही भाजपा के कई माननीय विधायक और नेता शामिल हैं। बोली और गोली के लिए मशहूर मुरैना में इन दिनों अवैध खनन का धंधा भ्रष्ट नेताओं और उनके गुर्गो के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है। एक तरफ वन एवं पर्यावरण मंत्रालय व प्राकृतिक संसाधन विभाग जंगल और पहाड़ों के रक्षार्थ नित्य नए उपाय तलाशने में जुटा है, वहीं संबंधित राज्य सरकारों में मौजूद लोग बिना किसी भय के अपना गोरखधंधा चला रहे हैं। भारत में जो हालात पैदा हो रहे हैं, उसके प्रति संसद और विधानसभा में बैठे लोगों को आज नहीं तो कल सोचना ही पड़ेगा, क्योंकि भ्रष्टाचार से बेहाल और एक अदद रोटी के लिए जद्दोजहद करने वाले करोड़ों लोग आने वाले दिनों में निश्चित तौर पर अपने जन प्रतिनिधियों का गला काटेंगे। आइपीएस नरेंद्र कुमार और अभियंता सत्येंद्र दुबे जैसे ईमानदार अफसरों की कुर्बानी कभी बेकार नहीं जाने वाली। ऐसी घटना उन भ्रष्ट अधिकारियों के लिए भी एक सबक है, जो अपने ईमान का सौदा कर रहे हैं।

अनियमितता का ठीहा बनी पंचायतें





भोपाल। मध्य प्रदेश में ग्राम पंचायतों औरं ग्राम कोषों का ऑडिट सीएजी के पर्यवेक्षण में स्वतंत्र एजेंसी के जरिए होने लगा तो गड़बड़ी मिलने का सिलसिला भी शुरू हो गया। मध्य प्रदेश पहला राज्य है, जहां संविधान संशोधन के बाद सबसे पहले पंचायत चुनाव कराए गए थे। कभी पिछड़े एवं वंचित वर्ग के राजनीतिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण को लेकर चर्चित हुईं, सूबे की पंचायतें अब आर्थिक अनियमितता एवं भ्रष्टाचार को लेकर चर्चा में हैं।
स्थानीय निधि संपरीक्षा द्वारा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख को सौंपी गई पहली समेकित ऑडिट रिपोर्ट 2009-10 से खुलासा हुआ कि पंचायतें न तो ऑडिट कराने में रुचि ले रही हैं, न ही इसमें सहयोग कर रही हैं। यहां तक कि हिसाब-किताब रखने की जिम्मेदारियों से भी बच रही हैं। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि पंचायतों में करोड़ों की अनियमितता हुई है। रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया है, अधिकतर जगहों पर मनरेगा के अभिलेख स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग को अंकेक्षण के लिए उपलब्ध नहीं कराने से शासन की इस सबसे महत्वपूर्ण एवं महत्वकांक्षी योजना का विधिवत अंकेक्षण संपादित नहीं हो पा रहा है।
शुरुआती दौर में आर्थिक मामलों में पंचायतों के अधिकार सीमित थे, पर पिछले कुछ साल से पंचायतों के जरिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। मनरेगा आने के बाद पंचायतों में पैसों का प्रवाह बहुत तेजी से बढ़ा है, पर ग्राम पंचायतों की ऑडिट स्वंतत्र एजेंसियों से कराने का प्रयास कभी नहीं किया गया। 11वें वित्त आयोग की अनुशंसा के बाद, आखिरकार सूबे के वित्त विभाग को ग्राम पंचायतों एवं ग्राम कोषों का ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पर्यवेक्षण में स्थानीय निधि संपरीक्षा के जरिए कराने का आदेश निकालना पड़ा। इस आदेश के बाद स्थानीय निधि संपरीक्षा ने ग्राम पंचायतों एवं ग्राम कोषों के अलावा जिला एवं जनपद पंचायतों की भी ऑडिट शुरू की। एक ओर, राज्य में ऑडिटरों की भारी कमी है, जिसकी वजह से सभी पंचायतों की ऑडिट संभव ही नहीं है, तो दूसरी ओर कई पंचायतें ऑडिट में सहयोग ही नहीं करना चाहतीं।
प्रदेश में 23,040 ग्राम पंचायतें, 313 जनपद पंचायतें एवं 50 जिला पंचायतें हैं, पर 2009-10 में 12,270 ग्राम पंचायतों, 84 जनपद पंचायतों एवं महज आठ जिला पंचायतों की ही ऑडिट हो पाई। राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह कहते हैं, यदि प्रदेश के सभी पंचायतों की ऑडिट हो तो वित्तीय अनियमितताओं के जो मामले सामने आएंगे, उनमें अरबों रुपये के भ्रष्टाचार का खुलासा होगा। सरकार का विकास से कोई लेना-देना नहीं है। वह यात्राओं में उलझी हुई है। इसका फायदा मैदानी अमला उठा रहा है। विकास कार्यों एवं मनरेगा के लिए मिलने वाली राशि में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है।
प्रदेश की पंचायतें भ्रष्टाचार एवं अनियमितता का ठीहा बन गई हैं। त्रिस्तरीय पंचायतों में कुल 9,388 लाख 12 हजार रुपए का अनियमित भुगतान किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे समस्त भुगतान, जो कि स्थापित नियमों के विपरीत किए गए हैं, अनियमित भुगतान हैं। ग्राम पंचायतों में अनियमित ऑडिट आपत्तियों की संख्या 17,178 है, जिसमें 8,944 लाख 89 हजार रुपये का अनियमित भुगतान हुआ है। इस मामले में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री पं.गोपाल भार्गव के क्षेत्र-सागर संभाग में सबसे ज्यादा 3,404 लाख 76 हजार रुपए का अनियमित भुगतान हुआ है। जनपद पंचायतों में 408 लाख 64 हजार रुपए का अनियमित भुगतान एवं जिला पंचायतों में 34 लाख 59 हजार रुपए का अनियमित भुगतान हुआ है। अनियमित भुगतान की वजह से भ्रष्टाचार की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।
पंचायतों में 41।15 लाख रुपए के गबन का मामला सामने आया है। इसमें सरपंच एवं सचिव ने मिलकर कई तरह की तिकड़में लगाईं। गबन के सबसे अधिक मामले इंदौर एवं ग्वालियर संभाग में उजागर हुए हैं। 50 जिला पंचायतों में से महज आठ का अंकेक्षण होने से, गबन का एक प्रकरण सिर्फ रीवा से सामने आया है।
ग्राम पंचायतों द्वारा 16,733 लाख 78 हजार रुपए की अनुदान राशि खर्च ही नहीं की गई। इस मामले में जनपद एवं जिला पंचायतों की भूमिका नकारात्मक रही है। रिपोर्ट में टिप्पणी की गई है, केंद्र एवं राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान राशि का उपयोग न हो पाना अत्यंत गंभीर बात है, क्योंकि यह राशि राज्य के सर्वांगीण विकास के लिए है। राशि का उपयोग नहीं होने का प्रमुख कारण त्रिस्तरीय पंचायती राज की प्रमुख संस्था जिला एवं जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों द्वारा अनुदान राशि को समय से ग्राम पंचायतों को उपलब्ध नहीं कराना एवं ग्रामीण यांत्रिकी विभाग के अधीन तकनीकी सेवाओं के लाभ को ग्राम पंचायत एवं ग्राम सभा स्तर तक नहीं पहुंचाया जाना है।
इस मामले में भी पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री का क्षेत्र-सागर संभाग आगे है, जहां 6,423 लाख 58 हजार रुपए की अनुदान राशि खर्च नहीं हो पाई। जनपद पंचायत, अनुदान राशि ग्राम पंचायतों को देने के बजाए ब्याज प्राप्ति के लिए खातों में रखते हैं, इसे अत्यंत आपत्तिजनक माना गया है। इन कमियों को छुपाने के लिए जिला पंचायतों ने ऑडिट के लिए मेमो का उत्तर देना तक मुनासिब नहीं समझा। अजय सिंह कहते हैं, राज्य सरकार एक ओर केंद्र पर भेदभाव का आरोप लगाती है, पर इस रिपोर्ट से उजागर हो जाता है कि ग्रामीण एवं सामाजिक विकास एवं वंचित वर्ग के लिए आ रही करोड़ों की अनुदान राशि का उपयोग नहीं हो रहा है।
पंचायतों ने नियम के विपरीत जाकर अग्रिम भुगतान करने में भी दिल खोलकर उदारता दिखाई। इस कारण 716 लाख 88 हजार रुपए अवशेष अग्रिम राशि है। कई निकायों में यह 20-25 साल से लंबित है। ग्राम पंचायतों की वित्तीय एवं कार्य अनियमितता के कारण 132।29 लाख रुपए की राजस्व की हानि भी हुई है। ग्राम पंचायतें नियम के विपरीत जाकर अपने को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा रही हैं। यह भी देखने में आया है कि व्यय करने के मामले में पंचायतें नियमों से परे जाकर बड़े पैमाने पर खर्च कर रही हैं, जो कि एक तरह का भ्रष्टाचार ही है। व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाकर भी जनपद पंचायतों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
पंचायती राज पर लंबे समय से काम कर रही एक स्वयं सेवी संस्था के निदेशक डॉ। योगेश कुमार कहते हैं, यह सही है कि ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार है, पर इसके लिए जिला एवं जनपद पंचायतें ज्यादा जिम्मेदार हैं, जो समय पर पंचायतों को पैसे नहीं देतीं। इससे ग्राम पंचायतों के सचिव एवं सरपंच की वित्तीय संधारण क्षमता कमजोर होती है। लेखा संधारण में अनुभव की कमी भी अनियमितता को बढ़ावा दे रही है।
पंचायतों में सबसे ज्यादा गड़बड़ी के मामलेे मनरेगा से जुड़े हुए हैं। जिला पंचायत स्तर पर इसे लेकर कोई रिकॉर्ड नहीं पाया गया। भले ही राज्य में मनरेगा में भ्रष्टाचार के मामले उजागर हुए हों, पर पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री पं। गोपाल भार्गव काम की तुलना में इसे बहुत कम मानते हैं। विधानसभा के शीतकालीन सत्र में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, 18 हजार करोड़ का काम हुआ है। इसके खिलाफ 205 करोड़ रुपए की शिकायत मिली है। यह लगभग एक प्रतिशत होता है। पर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने मध्य प्रदेश में मनरेगा के तहत कई गंभीर अनियमितताओं को देखते हुए 9 अगस्त, 2011 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर इसे रोकने एवं राज्य के तंत्र को प्रभावी बनाने का आग्रह किया था। फिर 17 नवंबर, 2011 के पत्र में उन्होंने मनरेगा पर वित्तीय नियंत्रण एवं सामाजिक जवाबदेही की व्यवस्था पर जोर दिया था।
फिलहाल भ्रष्टाचार का गढ़ बनती पंचायतों में भ्रष्टाचार रोकने के प्रयास नाकाफी दिख रहे हैं। स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग के पास सिर्फ 230 लोगों का ही अमला है, जिसके बूते 22 हजार से ज्यादा पंचायतों की ऑडिट असंभव है। विभाग के अमले को बढ़ाए बिना पंचायतों में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना संभव नहीं लगता।
आ जादी के बाद ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए महात्मा गांधी के सपनों के अनुरूप दो बड़े कार्यक्रम सामुदायिक विकास कार्यक्रम और पंचायती राज, 1952 और 1959 में शुरू किए गए। ये कार्यक्रम गांवों में कल्याणकारी राज्य की नींव डालने वाले थे। हालांकि ये कृषि के विकास के लिए भी बनाए गए थे, पर इनमें मुख्यत: कल्याण का उद्देश्य ग्रामीण भारत का चेहरा बदलना था, ताकि लोगों का जीवन स्तर सुधारा जा सके।
सामुदायिक विकास कार्यक्रम सीमित स्तर पर 1952 में शुरू किया गया, जिसमें 55 विकास प्रखंड चुने गए। प्रत्येक प्रखंड में 100 गांव और करीब 60 से 70 हजार की आबादी थी। 1960 के दशक के मध्य में देश का आधिकाधिक सामुदायिक ढांचा प्रखंडों के जाल में ढक गया, जिसमें 6,000 प्रखंड विकास पदाधिकारी और करीब 6,00,000 ग्राम सेवक नियुक्त किए गए जो इस कार्यक्रम को लागू कर सकें। इस कार्यक्रम में ग्रामीण जीवन के हर पक्ष को शामिल किया गया था। खेती बेहतर बनाने की विधियों से लेकर संचार, स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार आदि सभी पहलुओं को लिया गया था।
इस कार्यक्रम में लोगों द्वारा आत्मनिर्भरता तथा आत्म-सहायता और उत्तरदायित्व पर मुख्य रूप से जोर दिया जाना था। यह मूलत: जनता के अपने कल्याण के लिए, जनता के आंदोलन के रूप में संगठित किया जाने वाला कार्यक्रम था। नेहरू ने इस कार्यक्रम के शुभारंभ के अवसर पर 1952 में कहा था कि इसका मूल लक्ष्य जनता के बीच नीचे से शक्ति संचार करनेका था। एक तरफ यह आवश्यक था कि योजना बनाई जाए, उसका निर्देशन, संगठन और संयोजन किया जाए, परंतु दूसरी तरफ, उससे भी ज्यादा जरूरी, निचले स्तर से स्वत: विकास की आवश्यक परिस्थिति तैयार करना था।इसके अलावा कार्यक्रम में भौतिक उपलब्धि का लक्ष्य तो रखा गया था, परंतु इसका मूल उद्देश्य समुदाय और व्यक्ति को विकसित करना तथा व्यक्ति को अपने गांव और व्यापक अर्थों में भारत का निर्माता बना देना था।उन्होंने कहा कि प्राथमिक वस्तु है इसमें लगा मानव।
इसका दूसरा बड़ा उद्देश्य पिछड़े तबके को उठाना था: हमारा लक्ष्य समान अवसर और अन्य पक्षों को अधिक से अधिक ऊंचे स्तर पर ले जाना होना चाहिए।1952 और उसके बाद के वर्षों में, नेहरू बार-बार सामुदायिक विकास कार्यक्रम और उसके साथ जुड़ी राष्ट्रीय विस्तार सेवा की चर्चा नई सरकारऔर एक महान क्रांतितथा भारत के पुनरुत्थानशील भावना का प्रतीकके रूप में किया करते थे। यह कार्यक्रम विस्तार कार्यों को फैलाने में अच्छी तरह सफल हुआ। जैसे- बेहतर बीज, खाद आदि होने के परिणामस्वरूप आमतौर पर खेती का विकास तेज हुआ और खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा। इसके अलावा सड़क, तालाब, कुंआ, स्कूल तथा प्राथमिक चिकित्सा केंद्र आदि का निर्माण और शिक्षा एवं चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार हुआ। परंतु जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि कार्यक्रम एक प्रमुख उद्देश्य में विफल हो गया- वह था अपनी विकास गतिविधियों में लोगों की पूरी भागीदारी। न केवल इससे अपनी मदद स्वयं करने की भावना का विकास नहीं हो सका, बल्कि इसने सरकार से उम्मीदों और सरकार पर निर्भरता को और बढ़ा दिया। धीरे-धीरे इसका झुकाव सरकारी काम जैसा हो गया और अफसरशाही ढांचे का हिस्सा बनकर ऊपर से शासित होने लगा। पूरा काय्रक्रम रोजमर्रा की तरह बन गया। प्रखंड विकास पदाधिकारी पारंपरिक सब-डिवीजनल पदाधिकारी के प्रतिरूप बन गए और ग्रामसेवक उनके कर्मचारी। जैसा कि नेहरू ने बाद में 1963 के दौरान कहा कि जहां यह पूरा कार्यक्रम इस प्रकार बनाया गया था कि किसान को लीक पर से हटाया जा सके, जो पिछले कई युगों से उसी पर जीता चला आ रहा हैवहां यह कार्यक्रम खुद ही उसी लीक में धंस गया है।
इस कार्यक्रम की कमजोरी 1957 में ही स्पष्ट हो चुकी थी, जब बलवंत राय मेहता समिति को इसका मूल्यांकन करने का काम दिया गया। इस समिति ने इस कार्यक्रम के नौकरशाही के चंगुल में फंसने और लोगों की भागीदारी के अभाव की जमकर आलोचना की। इसके इलाज के लिए समिति ने यह सिफारिश की कि ग्रामीण और जिला स्तरीय विकास प्रशासन का लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण किया जाए। इस सिफारिश के आधार पर यह तय किया गया कि पूरे देश में ग्राम पंचायत को आधार बनाकर लोकतांत्रिक स्वशासन की समाकलित व्यवस्था शुरू की जाए। यह नई व्यवस्था पंचायती राज के नाम से जानी गई और विभिन्न राज्यों में 1959 से लागू की जाने लगी। इसमें प्रत्यक्ष रूप से चुने गए ग्राम पंचायत और अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए प्रखंड स्तरीय जिला परिषद के तीन स्तर बनाए गए। सामुदायिक विकास कार्यक्रम को पंचायती राज के साथ जोड़ दिया गया और बड़ी मात्रा में कार्य, वित्तीय संसाधन और अधिकार तीन स्तरीय समितियों को विकास कार्यक्रमों को चलाने के लिए सौंप दिए गए। इस प्रकार पंचायती राज के द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम की बहुत बड़ी कमजोरी जनता की भागीदारी तथा कार्यक्रमों को लागू करने एवं निर्णय लेने का अधिकार सौंप कर दूर करने की कोशिश की गई। इसके तहत अधिकारियों की भूमिका सिर्फ सहायता और निर्देश देने की रह गई। इसके साथ ही, गांवों में हजारों सहकारी संस्थाओं का जाल बुन दिया गया, जिनमें सहकारी बैंक, भूमि गिरवी बैंक, सेवा एवं बाजार सहकारी समिति आदि संस्थाएं बनाई गईं। ये सभी संस्था स्वायत्त थीं, क्योंकि इनका संचालन चुनाव के आधार पर बनी संस्थाओं द्वारा किया जाता था।
नेहरू का उत्साह फिर बढ़ गया क्योंकि पंचायती राज एवं सहकारी संस्थाएं समाज में अन्य क्रांतिकारी परिवर्तन की प्रतिनिधि थीं। इससे विकास और ग्रामीण प्रशासन का उत्तरदायित्व लोगों को प्राप्त हो रहा था, जिससे ग्रामीण विकास की गति तीव्र हो सकती थी। लेकिन एक या दूसरे रूप में पंचायती राज को स्वीकार कर लेने के बावजूद राज्य सरकारों ने इसके विषय में बहुत कम उत्साह दिखाया। उन्होंने पंचायती राज को कोई वास्तविक अधिकार प्रदान नहीं किया, बल्कि उनके कामों और शक्ति पर अंकुश लगाया और पैसे का अभाव पैदा कर उन्हें मर जाने के लिए मजबूर कर दिया। नौकरशाही ने भी ग्रामीण प्रशासन पर अपनी पकड़ बिल्कुल ढीली नहीं होने दी। पंचायतों का राजनीतिकरण हो गया और राजनीतिज्ञों ने गांव के अंदर गुटों का समर्थन हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल किया। परिणामस्वरूप, ग्रामीण स्वशासन की नींव तो डाल दी गई, परंतु इसका लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण मोटेतौर पर अवरूद्ध हो गया और बलवंत राय मेहता समिति एवं जवाहरलाल नेहरू द्वारा जो भूमिका इसे सौंपी गई, वह कभी पूरी नहीं हो पाई।
सामुदायिक विकास के लाभ, नई कृषि सुविधाएं और विस्तार सेवाएं मूलरूप से धनी और पूंजीवादी किसानों द्वारा हथिया ली गई। इन्हीं लोगों ने पंचायती राज संस्था पर भी प्रभुत्व जमा लिया। सामुदायिक विकास कार्यक्रम, पंचायती राज और सहकारी आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि इसने ग्रामीण समाज के अंदर वर्ग विभाजन को नजरअंदाज किया।
गांव पर समृद्ध, मध्यम और पूंजीवादी किसानों का सामाजिक और आर्थिक वर्चस्व था और न तो नौकरशाह और न ही समृद्ध ग्रामीण वर्ग जनता की भागीदारी और सामाजिक रूपांतरण के अग्रदूत बन सकते थे। यह ऐसा अन्य क्षेत्र था जिसमें नेहरू युग की भूमि सुधार उपायों की कमजोरियां उजागर हो गईं।

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

भावी प्रधानमंत्री अपराधियों की मोटर साइकिल पर



विनोद उपाध्याय

राजनीति में अपनी पैठ बनाने के लिए नेता किस हद तक जा सकते हैं इसके नजारे हम रोज देखते और सुनते है। ऐसा ही नजारा पिछले दिनों राजस्थान के गोपालगढ़ में देखने को मिला,जहां देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी एक अपराधी की मोटर साइकिल पर सवार होकर 6 किलोमीटर घूमे।
दरअसल गोपालगढ़ में पिछले दिनों हुए एक गोलीकांड में राजनीति की रोटी सेंकने का सिलसिला चल रहा था। कांग्रेस ने इस बहती गंगा में हाथ धोने के लिए राहुल गांधी को बुला लिया। भाजपा ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने जिन दो लोगों की मोटर साइकिल पर बैठकर गोपालगढ़ और आसपास के गांवों का दौरा किया था, उन दोनों के खिलाफ क्षेत्र के थानों में कई मामले दर्ज है। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि राहुल ने एक समुदाय के लोगों के मिलकर दोनों समुदाय के लोगों के बीच वैमनस्य के बीज बो दिए हैं। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी और प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. दिगंबर सिंह ने बताया कि राहुल पहाड़ी तहसील के पथराली गांव पहुंचे, उस समय उनके आगे बिल्ला उर्फ आशू पुत्र इस्माइल मोटर साइकिल चला रहा था। बिल्ला के खिलाफ पहाड़ी थाने में कई मामले दर्ज हैं। राहुल गांधी पथराली में सरफराज उर्फ शरफू पुत्र हिम्मत के घर गए। चतुर्वेदी और डॉ. सिंह ने आरोप लगाया कि शरफू मेवात इलाके में टटलू गैंग का सरगना है और उसके खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हैं। एक मामले में उसके खिलाफ स्टेंडिंग वारंट भी जारी है, फिर भी शरफू बेखौफ सरेआम घूम रहा है। पथराली में एक मृतक के घर सांत्वना देने पहुंचे राहुल गांधी के साथ बिल्ला और शरफू दोनों थे।
राहुल बिल्ला की मोटर साइकिल पर और उनका निजी सहायक शरफू की मोटर साइकिल पर बैठकर गोपालगढ़ में गए थे। गोपालगढ़ में मस्जिद देखने के बाद जाते समय राहुल ने बिल्ला से गले लगाया और कोई काम होने पर दिल्ली आने का न्यौता भी दिया। इस यात्रा के बाद इन दोनों ने क्षेत्र में दहशत फैलाना शुरू कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों अपराधी कामां विधायक जाहिदा के कृपापात्र हैं। चतुर्वेदी ने यह भी आरोप लगाया कि राहुल की यात्रा के बाद दोनों समुदाय में वैमनस्य बढ़ा है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की यात्रा के बाद ही सीबीआई की टीम जांच के लिए आई है, इससे भी जांच पर शक होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि जांच में अगर एकतरफा कार्रवाई की तो भाजपा आंदोलन करेगी। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के इस गुपचुप दौरे ने यह भी साबित कर दिया है कि दिल्ली के नेताओं को राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है।
उधर स्थानीय विधायक अनीता सिंह ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के गोपालगढ़ दौरा को महज दिखावटी व राजनीति से प्रेरित बताया है। विधायक सिंह ने कहा कि मेवात क्षेत्र में राहुल का दौरा न यूपी चुनावों की राजनीति से प्रेरित है। उन्होंने एक पक्ष के लोगों से मिलकर कांग्रेस की पुरानी तुष्टिकरण वाली नीति को उजागर किया है। गोपालगढ़ कस्बे में फायरिंग के बाद राज्य सरकार द्वारा एसपी व कलेक्टर को निलंबन करना सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा देना है। इससे मेवात क्षेत्र में दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ेगा। जिससे शांति व्यवस्था कायम होने में समय लगेगा। विधायक अनीता सिंह ने कहा कि राहुल को मेवात क्षेत्र में शांति कायम करने के लिए दोनों पक्षों के लोगों से मिलना था। तभी घटना की सही स्थिति उन्हें मिल पाती।
उल्लेखनीय है कि 14 सितंबर को गोपालगढ़ फायरिंग में मारे गए लोगों और घायलों के परिजनों से मुलाकात करने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी 9 अक्टूबर की सुबह करीब नौ बजे अचानक गोपालगढ़ पहुंचे थे। उनके साथ केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह भी थे। कहा तो यह भी जा रहा है कि राहुल के इस दौरे की जानकारी न सरकार को थी न प्रशासन को। राहुल करीब दो घंटे तक मोटरसाइकिल पर बैठकर गोपालगढ़ के अलावा पिथोली, परसोली व मालिगा गांवों में घूमे। उधर प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि 8 अक्टूबर की दोपहर राहुल गांधी की टीम के तीन व्यक्ति गांव पथराली पहुंचे थे। इनकी गाडिय़ों पर नंबर प्लेट नहीं थीं। तीनों लोग गांव के बिल्ला नामक युवक से मिले और गांव व घटना के बारे में जानकारी ली।
बिल्ला के अनुसार तीनों व्यक्तियों में से एक ने अपना नाम चंदर खां बताया और दूसरे ने यादव। तीसरे ने अपने बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी। इन तीनों व्यक्तियों ने बिल्ला से गोपालगढ़ फायरिंग में मारे गए लोगों के घर ले जाने की बात कही। तीनों से पीडि़तों के घर देखे। गांव के कुछ अन्य लोगों से भी घटना की जानकारी की। इसके बाद बिल्ला से कहा कि 9 अक्टूबर सुबह उनके साहब आएंगे। मदद करना। बिल्ला ने स्वीकृति दी। 8 अक्टूबर की सुबह सात बजे बिल्ला को चंदर ने फोन किया और कहा कि तिलक पुरी आ जाए। बिल्ला तिलक पुरी से थोड़ी दूर ही था कि गाडिय़ों के काफिले ने उसे रोक लिया। टूरिस्ट गाड़ी से राहुल गांधी को उतरते देख बिल्ला भी हैरान रह गया। राहुल बिना देर किए बिल्ला की मोटरसाइकिल पर बैठ गए और मोबाइल स्विच ऑफ करा दिया। इसके बाद बिल्ला से कहा गया कि 8 अक्टूबर को जहां गए थे, वहीं ले चलें। यह स्थान तिलक पुरी से एक किलोमीटर दूरी पर था। यहां से दो किलोमीटर दूर गांव पथराली, इतनी ही दूरी पर मालीकी तथा एक किलोमीटर दूर पिपरौली गांव पहुंचे। यहां से राहुल कार से गोपालगढ़ गए। इस तरह राहुल ने 6 किलोमीटर का सफर मोटरसाइकिल से तय किया। राहुल के गोपालगढ़ दौरे को लेकर प्रदेश में राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। प्रदेश कांग्रेस और सरकार के रहनुमाओं की नजरें अब राहुल के रुख पर टिकी हैं। उधर भाजपा इस मामले को तूल देने की कोशिश कर रही है। अब देखना यह है कि शह मात के इस खेल में कौन बाजी मारता है।

टीम भूरिया में टसन



विनोद उपाध्याय

मध्य प्रदेश में दो साल पहले की सत्ता का संग्राम शुरू हो गया है। प्रदेश में पहली बार करीब 8 साल तक सत्ता से दूर रहने के कारण कांग्रेस में सत्ता हथियाने की ललक देखी जा रही है। लेकिन प्रदेश में भाजपा की स्थापित सरकार को हटाने का सपना देख रही कांग्रेस आलाकमान ने छह महीने के इंतजार के बाद प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया को जो टीम दी है उसको लेकर बवाल मचा हुआ है। आलम यह है कि जिन नेताओं को भाजपा से लडऩा था वे अपने में ही जूझ रहे हैं।
कागज ही नहीं धरातल पर भी कांग्रेस से कई गुना मजबूत भाजपा से मुकाबला करने कांतिलाल भूरिया को जो टीम मिली है उसमें 11 उपाध्यक्ष, 16 महामंत्री और 48 सचिव बनाए गए हैं। कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी में पहली बार कांतिलाल भूरिया ने बरसों पुरानी चली आ रही परिपाटी को बदलने की हिम्मत जुटाकर ज्यादातर युवाओं को अपनी टीम का हिस्सा बनाया है, जिनमें कुछ तो काम के हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश नाम कांगे्रसियों के लिए संभवत: एकदम नए हैं। चूंकि भूरिया को काम इन्हीं से चलाना पड़ेगा, लिहाजा उन्हें इन्हीं चेहरों को काम वाला बनाना पड़ेगा। मिशन-2013 के लिए भूरिया को कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री द्वय कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी जैसे नेताओं को साथ रखना अनिवार्य होगा। यानी यवाओं के नाम पर भले ही भूरिया को नई टीम सौंप दी गई है लेकिन काम दिग्गजों को ही करना होगा। लेकिन कार्यकारिणी में अपने समर्थकों की उपेक्षा होने के कारण ये नेता भूरिया का साथ देंगे या नहीं यह शोध का विषय है।
कांग्रेस की कार्यकारिणी घोषित होने के बाद अनेक पार्टीजनों में पैदा असंतोष दूर होने का नाम नहीं ले रहा है। केंद्रीय नेताओं को चि_ियां लिखी जा रही हैं और राजधानी भोपाल में पर्चेबाजी हो रही है। कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। अपनी वरिष्ठता के मुताबिक पद नहीं मिलने से नाराज कुछ पदाधिकारी कांग्रेस दफ्तर में फटक तक नहीं रहे। उन्हें दिलासा दिया जा रहा है कि सूची में जल्द संशोधन होगा। हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया की तरफ से इस तरह के कोई संकेत नहीं दिए जा रहे हैं। भूरिया छह माह पहले अप्रैल में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष मनोनीत किए गए थे। उनकी टीम बनते-बनते छह माह का वक्त लग गया। उम्मीद की जा रही थी कि गुटीय न सही मगर क्षेत्रीयता और वरिष्ठता के लिहाज से पदाधिकारियों की सूची संतुलित होगी, मगर ऐसा नहीं हो पाया। पदाधिकारियों, विशेष आमंत्रित सदस्यों और अन्य समितियों में समायोजित किए गए कुछ चेहरे तो ऐसे हैं, जो वर्षो से घर बैठे थे। ऐसा लगता है कि उन्हें झाड़-फूंक के पद दे दिया गया है।
प्रदेश में अन्य कांग्रेसी नेता भूरिया का साथ दे या न दे दिग्विजय सिंह का उन्हें भरपूर सहयोग मिलेगा। इस बात का संकेत इससे भी मिलता है कि नवगठित प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी में अधिकतर दिग्विजय समर्थकों का ही दबदबा है। एक तरफ जहां पार्टी के तीन प्रमुख पदों पर दिग्विजय समर्थकों का कब्जा है वहीं नवगठित कार्यकारिणी में उनके समर्थकों की भरमार है। वहीं जिला इकाइयां भी दिग्विजय सिंह समर्थकों की मु_ी में हैं। राज्य के अन्य प्रमुख नेता केंद्रीय मंत्री कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थकों को अहम जिम्मेदारी दिलाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं। असंतोष की आवाज प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के जिले और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के करीबी लोगों से आई है। सचिव बनाए गए रतलाम के राजेंद्र सिंह गेहलोत ने पद लेने से इंकार कर दिया है। भूरिया रतलाम के सांसद हैं। प्रदेश कांग्रेस सेवादल के अध्यक्ष और कांग्रेस कमेटी के सचिव रहे गेहलोत को भूरिया ने महासचिव बनाने का वादा किया था, लेकिन दिल्ली से जो सूची आयी उसमें गेहलोत सचिव बनाए गए। इससे दुखी गेहलोत ने भूरिया को फोन कर सचिव का पद लेने से इंकार कर दिया है। यही हाल सचिव बने महेंद्र सिंह चौहान का है। वे नेता प्रतिपक्ष सिंह के करीबी हैं। उन्हें भी महासचिव या उपाध्यक्ष बनने की आस थी, लेकिन वे भी इस पद को लेने से मान कर रहे हैं। उनके साथ छात्र राजनीति करने वाले कई नेता महासचिव और उपाध्यक्ष बनाए गए जबकि चौहान को सचिव बना कर संतुष्ट करने का प्रयास किया गया।
नए पदाधिकारियों में से कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी पहचान का संकट मीडिया में ही नहीं, पार्टी में भी है। मसलन भोपाल की तनिमा दत्ता को महासचिव बनाया गया है। उन्हें भोपाल जिला कांग्रेस में कोई पहचानता नहीं है। प्रबंध समिति के साथ उन्हें प्रवक्ता भी बनाया गया है। बताया जाता है कि वे युवक कांग्रेस नेता रहे अश्विनी श्रीवास्तव की नजदीकी रिश्तेदार हैं। उन्हें कैप्टन जयपाल सिंह ने भूरिया से मिलवाया था। दत्ता तो महासचिव बन गई, लेकिन गृहमंत्री रहे कैप्टन को कुछ नहीं मिला है। मगर अब तक प्रदेश कार्यालय में संगठन का कागजी काम देखते रहे केप्टन जयपाल सिंह की क्या भूमिका रहेगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया है। वह अब तक महामंत्री का दायित्व निभा रहे थे। अंग्रेजी ज्ञान अच्छा होने के कारण पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सुरेश पचौरी ने भी उन्हें अपनी टीम में बरकरार रखा था। बल्कि उनकी गिनती पचौरी के निकटतम सिपहसालारों में होने लगी थी। उन्हें तत्कालीन अध्यक्ष सुभाष यादव ने प्रदेश कांग्रेस दफ्तर में जगह दी थी। इसी तरह भूरिया के नजदीकी शांतिलाल पडिय़ार का नाम भी नहीं है। पडिय़ार अब तक प्रभारी महामंत्री की भूमिका में काम कर रहे थे। भूरिया ने अपने दौरों का काम देखने के लिए भोपाल के जिस संजय दुबे को कांग्रेस दफ्तर में टेबिल कुर्सी मुहैया कराई थी, वह भी सूची से नदारद हैं। देखा जाए तो भूरिया की कोर टीम में से सिर्फ प्रमोद गुगालिया ही एकमात्र ऐसे शख्स हैं, जिन्हें प्रवक्ता बनने में कामयाबी मिल सकी है। यह अलग बता है कि भूरिया ने अध्यक्ष बनते ही उनको मीडिया प्रभारी बनाया था। बहरहाल ऐसा क्यों हुआ, इसके कारण तलाशे जा रहे हैं।
भोपाल में केरोसिन का कारोबार करने वाले अब्दुल रज्जाक और निजामुद्दीन अंसारी चांद को सचिव बनाया गया है। रज्जाक के बारे में कहा जाता है कि वे भूरिया को चेहरा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे, यहां तक कि भूरिया की यात्राओं के दौरान वे साथ रहने की गरज से रेल या प्लेन का टिकट लेने से भी नहीं हिचकते थे। चांद और ईश्वर सिंह चौहान पिछले चुनावों में कांग्रेस की खिलाफत कर चुके हैं। यही स्थिति एक अन्य महामंत्री जीएम राईन भूरे पहलवान को लेकर है। नई सूची में पदाधिकारी बने एक नेता ने कहा, आपकी तरह हमारे लिए भी ये दोनों नाम खोज का विषय हैं। प्रदेश सचिव बने रज्जी जॉन और जैरी पॉल के मामले में भी ऐसी ही स्थिति है। कांग्रेसी ही सवाल कर रहे हैं कि कौन हैं ये लोग? प्रभारी महासचिव और मुख्य प्रवक्ता रह चुके मानक की 2009 लोकसभा चुनाव के बाद कार्यालय में वापसी हुई है।
उधर उज्जैन से सासद प्रेमचंद गुड्डïू ने भूरिया के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भूरिया से नाराज कई नेता गुड्डïू से जुड़ गए हैं। भूरिया के प्रदेश कार्यकारिणी बनाने के बाद गुपचुप बैठकों के दौर तो शुरू हो गए थे। मगर अब जल्दी ही खुलकर बगावत के आसार बन रहे हैं। कभी कमलनाथ के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले गुड्डïू के घर कमलनाथ समर्थक भी पहुंच रहे हैं। गुड्डïू ने भी नाराज काग्रेसियों से बात करना शुरू कर दिया है। मालवा-निमाड़ के सभी दिग्गज भूरिया के फैसले से नाराज तो थे, मगर विरोध करने की पहल से बच रहे थे। मगर खुद के समर्थकों को दरकिनार करने के बाद गुड्डïू ने भूरिया विरोध की कमान संभाल ली है। बताया जा रहा है कि कमलनाथ के विरोध के कारण जो सज्जन सिंह वर्मा कभी गुडू से खार खाते थे वो भी गुड्डïू के साथ जा खड़े हुए हैं। कांग्रेस नेता पंकज संघवी, विधायक अश्र्विन जोशी भी गुड्डïू के साथ भूरिया विरोध की तैयारियों में जुट गये हैं। वहीं महेश जोशी, शोभा ओझा, सत्यनारायण पटेल की भी गुड्डïू से इस सम्बन्ध में बात हुई है। गुड्डïू सिंधिया खेमे के विरोधी माने जाते हैं। मगर जिन सिंधिया समर्थकों को घर बैठा दिया गया है वो भी गुड्डïू से हाथ मिलाने के लिये तैयार हैं। माना जा रहा है कि आने वाला वक्त भूरिया और प्रदेश काग्रेस के लिए सुकून भरा नहीं होगा।

सबसे ज्यादा हैरानी बुंदेलखंड की स्थिति को लेकर है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने बुंदेलखंड के पिछड़ेपन को दूर करने केंद्र सरकार से अड़तीस सौ करोड़ रुपये का विशेष पैकेज तो दिला दिया, मगर जब पार्टी संगठन में इलाके को प्रतिनिधित्व देने का मौका आया तो धेला नहीं मिला। प्रदेश पदाधिकारियों की 75 लोगों की सूची में से सिर्फ पांच नाम बुंदेलखंड से हैं। यदि प्रवक्ता को भी जोड़ लिया जाए तो यह संख्या छह हो जाती है। इसमें भी वरिष्ठता का ख्याल नहीं रखा गया। बुंदेलखंड में छह जिले हैं। मगर सभी को तरजीह देने के बजाए दमोह और सागर से पांच नाम ले लिये गए। दमोह की हटा तहसील से दो लोगों को शामिल किया गया है। दिग्विजय सिंह के मंत्रिमंडल में रहे राजा पटेरिया को प्रवक्ता जैसा मामूली पद दिया गया, जबकि उनसे बहुत जूनियर मनीषा दुबे महामंत्री बना दी गई। दोनों ही ब्राह्मंाण हैं। सागर जिले की बात करें तो बीना के अरुणोदय चौबे उपाध्यक्ष और राजेन्द्र सिंह ठाकुर सचिव बनाए गए हैं।
तीन लोकसभा और 23 विधानसभा क्षेत्र वाले इस इलाके में जातीय समीकरणों का हमेशा महत्व रहा है। मगर कांग्रेस की सूची में इसका भी ख्याल नहीं किया गया। वोटों में भागीदारी के लिहाज से देखें तो लगभग 30 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 28 प्रतिशत ओबीसी, पांच फीसदी ब्राह्मंाण, पांच प्रतिशत ठाकुर, चार प्रतिशत मुस्लिम सहित अन्य अल्पसंख्यक, 15 प्रतिशत आदिवासी और बारह प्रतिशत वैश्य समाज है। मगर दलित, आदिवासी, ओबीसी और वैश्य कांग्रेस की सूची में जगह बनाने में कामयाब नहीं हो सके।
सूत्रों का कहना है कि बुंदेलखंड में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की दिलचस्पी के कारण इलाके के कांग्रेसी इस उम्मीद में हैं कि इस विसंगति की तरफ उनका ध्यान जाएगा तो सूची में सुधार जरूर होगा। जानकारों का कहना है कि इसके पूर्व सुरेश पचौरी के कार्यकाल में बुंदेलखंड से ग्यारह पदाधिकारी थे। भूरिया तो पुराने आंकड़े को ही बरकरार नहीं रख पाए। बहरहाल, कांग्रेसजन किसी तरह राहुल के पास वस्तुस्थिति पहुंचाने में लगे हैं ताकि इस पिछड़े इलाके की भलाई के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री से विशेष पैकेज दिलवाने में जो भावना दिखाई, उसकी एक झलक कांग्रेस की लिस्ट में भी दिखाई पड़े।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी को लेकर भले ही कांग्रेसी हल्ला मचा रहे हो, लेकिन कप्तान भूरिया तो गदगद हैं और वे गर्व से कह रहे है कि इससे अच्छी कार्यकारिणी नहीं बन सकती थी। कांतिलाल भूरिया से जब उनकी टीम को लेकर बात की, तो कहने लगे कि आम कांग्रेसी खुश है। मैंने सबको जगह देने की कोशिश की है। पहली 33 फीसदी महिलाओं को पद दिए हैं। जब उनसे कहा कि टीम का तो विरोध हो रहा है? तो वे बोले - किस बात का विरोध? सभी नेताओं से बात की थी। बड़े नेताओं से नाम लिए थे, जो पंद्रह-बीस साल से काम कर रहे हैं, उनको भी भाव दिया है, सीनियर नेताओं को अनुभव के लिए साथ में रखा। युवाओं को दौडऩे के लिए बनाया। उन महिला नेत्रियों को मौका दिया, जो पहले से महिला कांग्रेस में काम कर रही थी। पार्षद, विधायक और जिला पंचायत प्रतिनिधि रही।
नए चेहरों के पास अनुभव की कमी है, तो अनुभवियों के पास कोई अधिकृत पद नहीं है, ऐसी स्थिति में अब प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष पर ये लोग दवाब बढ़ा सकते हैं। जानकारों का कहना है कि कांगे्रस ने बरसों बाद उन कांगे्रसियों की भी सुध ली है, जो हासिए पर थे। युवा कंधों पर बूढ़ी कांगे्रस का भार मिशन-2013 में कांगे्रस को कितनी मजबूती दे पाता है, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, मगर सबसे खास यह होगा कि कांगे्रस अध्यक्ष भूरिया को अब इन्हीं नए और गैरअनुभवी चेहरों के अनुभव को बढ़ाते हुए इस चुनावी रणभूमि में जंग के लिए उतरना होगा।

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

प्रधानमंत्री पद को लेकर भाजपा में रार



विनोद उपाध्याय

घोटालों से घिरी कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के फिर सत्ता में नहीं आने की धारणा के बीच भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए घमासान शुरू हो गया है। पार्टी को लग रहा है कि इस बार उसे उत्तर भारत के कांग्रेस प्रभावित क्षेत्रों में अच्छी सफलता हासिल होगी। भले ही वह अकेले अपने दम पर सरकार न बना पाए, मगर भाजपानीत एनडीए तो सत्ता में आ ही जाएगा। जाहिर तौर पर भाजपा सबसे बड़ा दल होगा, लिहाजा उसी का नेता प्रधानमंत्री पद पर काबिज हो जाएगा। इस अनुमान के आधार पर भाजपा नेताओं में प्रधानमंत्री पद पाने की होड़-सी लग गई है और पार्टी गाइड लाइन को दरकिनार कर नेता स्वयंभू प्रधानमंत्री बनने के जतन में जुट गए हंै।
राजनीतिक संकेतों और भाजपा के सूत्रों की मानें तो पार्टी में प्रधानमंत्री पद के दावेदार नेताओं में लालकृष्ण आडवानी,सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, यशवंत सिन्हा और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा जद(यू) से नितीश कुमार अपने-अपने तरीके से दावा पेश कर रहे हैं।
इस दृश्य को देखकर एक बात तो साफ झलक रही है कि अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक अवसान के बाद आज भाजपा ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां कोई किसी का माई-बाप नहीं है। 31 साल की युवा भाजपा जिसका उदय भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथ की ओर ऐतिहासिक मोड़ माना गया, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी ने करीब छह साल तक सत्ता के शिखर पर बैठाया आज उसके प्रौढ़ और बुजुर्ग नेताओं में इतना सामथ्र्य नहीं रहा की वे एक-दूसरे को एकता के बंधन में बांध सके और संघ की धार भी भोथर हो गई है। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि नेता अपनी डफली अपना राग अलाप रहे हैं और पार्टी रसातल की ओर जा रही है।
लोकसभा चुनाव 2014 में होना है पर भाजपा के अंदर प्रधानमंत्री पद के लिए घमासान छिड़ गया है। यहां एक नहीं कई प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। जिससे पूछो वही कह बैठता है मेरे में क्या कमी है। हालांकि कुछ वरिष्ठ नेता अपने को इस दौर से बाहर रखे हुए हैं पर कुछ ने खुलकर अपनी दावेदारी पेश कर दी है। पार्टी में कुछ माह पूर्व तक लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली के बीच ही प्रधानमंत्री पद को लेकर प्रतिस्पर्धा चल रही थी, मगर अब दावेदारों की लंबी फौज सामने आने लगी हैं। गुजरात में लगातार दो बार सरकार बनाने में कामयाब रहे नरेन्द्र मोदी ने गुजरात दंगों से जुड़े एक मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देश को अपनी जीत के रूप में प्रचारित कर अपनी छवि धोने की खातिर शांति और सद्भावना के लिए तीन दिवसीय उपवास किया। उसी दौरान अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च रिपोर्ट में उनकी तारीफ करते हुए ऐसा माहौल बना दिया कि अगले आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद का मुकाबला मोदी और राहुल गांधी के बीच हो सकता है। इससे मोदी का हौंसला और बढ़ गया और शांति और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए तीन दिन के उपवास के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि बदल कर सर्वमान्य नेता बनने का प्रयास किया। जाहिर तौर पर इससे सुषमा स्वराज व जेटली को तकलीफ हुई होगी। वे ही क्यों पिछले चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किए गए आडवाणी तक को तकलीफ हुई और उन्होंने न केवल रथयात्रा की घोषणा की बल्कि अपने प्रिय नेता नरेन्द्र मोदी के कट्टर विरोधी बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार की अगुआई में जयप्रकाश नारायण की तथाकथित जन्मस्थली सिताब दियरा से अपनी रथ यात्रा भी शुरू कर दी है।
आडवाणी ने रथ यात्रा तो शुरू कर दी है लेकिन उस पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सबसे पहला यह की आडवाणी अपनी यात्राओं को रथयात्रा ही नाम क्यों देते हैं? रथ आवाम से नहीं जोड़ता है। जनता से दूर ले जाता है। रथ सामंती प्रतीक है। हमारी परम्परा में रावण रथी है। और रघुवीर विरथ। रथ लोक से काटता है, फिर भी लालकृष्ण आडवाणी बिना घोड़ों के रथ पर सवार हैं। पार्टी, मित्रों और संघ परिवार की इच्छा के खिलाफ आडवाणी की रथयात्रा निकल चुकी है। आडवाणी 'आदि रथयात्रीÓ हैं। उनकी यात्रा के निहितार्थ सब जानते हैं। आखिर क्यों वे संघ और भाजपा के कई अपमानजनक शर्तों के बावजूद रथ पर सवार हो रहे हैं? कौन सी मजबूरी है कि प्रधानमंत्री पद की आमरण उम्मीदवारी छोडऩे को वे तैयार नहीं हैं? देश इक्कीसवीं सदी के उस मुकाम पर है। जहां से राजनीति के सूत्र युवाओं के हाथ जा रहे हैं। देश में 72 करोड़ 99 लाख मतदाताओं में से 50 प्रतिशत युवा हैं। राहुल गांधी मुकाबले में हैं। युवा आगे देख रहा है और रथ पीछे ले जाता है। इसलिए आडवाणी की रथयात्रा युवा वर्ग को लुभाती नहीं है। शायद इसी सोच से संघ और भाजपा अपना नेता बदलना चाहते हैं। वे दूसरी पीढ़ी को सत्ता सौंपना चाहते हैं। राजनीति के प्रतीक बदलना चाहते हैं। रथ, राम, अयोध्या और उग्र हिन्दुत्व से परे नए प्रतीक। ताकि भाजपा एक ऐसा उदार राजनैतिक दल बने जिसमें युवा वर्ग अपना भविष्य देख सके। ऐसे नए वैचारिक उपकरण बने जिससे युवा मतदाताओं के तार सीधे जुड़ सके। इसलिए संघ का जोर दूसरी पीढ़ी की ओर है, पर आडवाणी की प्रधानमंत्री पद की चाह रास्ते की अड़चन। आडवाणी की दुर्दशा देखिए। भाजपा के भीतर जो गडकरी, जेटली, वेंकैया, सुषमा स्वराज और नरेन्द्र मोदी इस रथयात्रा के खिलाफ खड़े थे, वे सब आडवाणी द्वारा गढ़े गए हैं। पार्टी में आडवाणी ने उन्हें बड़ा बनाया है। पर उस सवाल पर जंग खाए लौह पुरुष पार्टी में अकेला पड़ गया है।
दरअसल आडवाणी दो परिवारों के बीच पिस रहे हैं। एक-उनका अपना परिवार है। जो उन्हें प्रधानमंत्री देखना चाहता है। उसकी दलीलें हैं, कि मोरारजी भाई तो 83 की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे। फिर दादा की सेहत अच्छी है। दिमाग दुरुस्त है। पार्टी में सबसे ज्यादा योगदान है। दूसरा है संघ परिवार। जो किसी भी कीमत पर आडवाणी को अब भाजपा की मुख्यधारा में रहने देना नहीं चाहता। वह जल्दी में है दूसरी पीढ़ी के लिए। इन दो परिवारों के बीच मुश्किल हैं। फिर क्या करें लौहपुरुष? एक सम्मानजनक रास्ता है। वे उस पर क्यों नहीं जाना चाहते? अगर आडवाणी गांधी, लोहिया, जयप्रकाश या अन्ना से नहीं सीख सकते, तो उन्हें कम से कम सोनिया गांधी से ही सीखना चाहिए। कैसे कुर्सी की दौड़ से अलग रह कर राजनीति में हस्तक्षेप किया जा सकता है। कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए दिन-रात अथक परिश्रम कर रही हैं। क्या भाजपा के लिए आडवाणी के मन में ऐसी भावना नहीं जाग सकती?
पहले आरएसएस के संकेतों, इशारों और अब साफ-साफ कहने के बावजूद आडवाणी राजनीति से हटने को तैयार नहीं हैं। देश ने पिछले आम चुनावों में नेता के तौर पर उन्हें खारिज किया है। इसलिए संघ पिछले दो साल से आडवाणी के राजनैतिक सन्यास की घोषणा सुनना चाहता है। आडवाणी उस रास्ते जा भी रहे थे। पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हिलती कुर्सी देख। वे लौट आए। उनकी लालसा जगी। उन्हें लगा भाजपा में सामूहिक नेतृत्व पर बात नहीं बन रही है। वहां प्रधानमंत्री पद के लिए आधा दर्जन से ज्यादा उम्मीदवार हैं। ऐसे में रथयात्रा के जरिए वे दोबारा सत्ता में आने के लिए दावेदारी कर सकते हैं। पर उनकी इस योजना की हवा इस बार विपक्ष ने नहीं अपनों ने ही निकाल दी। यही वजह है 11 अक्टूबर से निकली उनकी रथयात्रा इस बार कोई माहौल पैदा नहीं कर पा रही है। पार्टी के बड़े नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने हाथ खींच लिए थे। पार्टी का यह रुख देख आडवाणी ने रथयात्रा नितीश कुमार के हवाले कर दी। वरना हर कोई जानता है कि जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताब दियारा बिहार में नहीं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में है। सिताब दियारा का जेपी का मकान स्मारक और कुटुम्ब के लोग आज भी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में रहते हैं। घाघरा के कटाव से गांव का सीमांत बिहार के सारण जिले में जरूर पड़ता है। पर सिताब दियारा रेवन्यू गांव यूपी का है। यूपी में फिजा नहीं बन सकती। इस दौरान यूपी में राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र दोनों अपनी-अपनी यात्राएं लेकर यहां निकल रहे हैं, सो उत्तर प्रदेश में पार्टी ने हाथ खड़े किए। इसलिए रथयात्रा अब नितीश कुमार के हवाले हुई। इस शर्त के साथ कि यात्रा में लगने वाले नारे, पोस्टर में ऐसा कोई जिक्र और उल्लेख नहीं होगा जो रथयात्री को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताए।
लालकृष्ण आडवाणी ने निश्चिततौर पर भाजपा को सत्ता की राजनीति के सर्वश्रेष्ठ दिन दिखाए हैं। जनसंघ से भाजपा तक उनका योगदान बेजोड़ रहा है। उनकी पहली रथयात्रा ने पूरे देश में रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए एक उफान पैदा किया था। उस लिहाज से वे पार्टी के केंद्र में रहे। आडवाणी की खुद की यात्रा भी कम रोचक नहीं है। पहले वे अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक रहे। फिर उनके समकक्ष हुए। बाद में प्रतिद्वंदी बने। हालांकि पार्टी के भीतर उनकी कभी सर्वमान्य नेता की हैसियत नहीं रही। यह संयोग है कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रतिद्वंदी बनने के बावजूद आडवाणी तभी तक ताकतवर थे। जब तक वे अटल बिहारी वाजपेयी की छाया में थे। उससे निकलते ही वे न सिर्फ प्रभावहीन हुए। पार्टी के क्षत्रपों ने उनका विरोध शुरू कर दिया। उन्हे लगा कि प्रधानमंत्री बनने के लिए अटल जैसा उदार चेहरा चाहिए। अपने चेहरे को उदार बनाने के लिए उन्होंने जिन्ना का सहारा ले लिया। बस यहीं से शुरू हुई गड़बड़। जिन्ना प्रकरण के बाद संघ ने उनकी नाक में नकेल डाली। बीजेपी के नए नेतृत्व ने उन्हें लगभग धकिया कर नेतृत्व की दौड़ से बाहर किया। पर कमजोर होते मनमोहन सिंह और भ्रष्टाचार के आरोपों से साख खोती सरकार ने उनकी सारी उम्मीदें जगा दी। अब देखना यह है की आडवाणी की मंशा पर विपक्ष पानी फेरता है या अपने?
प्रधानमंत्री पद के एक अन्य दावेदार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का जनाधार अन्य नेताओं के मुकाबले अधिक है, लेकिन उन्हें कट्टरपंथी माना जाता है, इस कारण राजग के घटक दल उनके नाम पर सहमति नहीं देंगे। आज की तारीख में भाजपा में अगर कोई जन नेता है तो अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा नरेंद्र मोदी का ही नाम लिया जा सकता है। वाजपेयी के अलावा मोदी की ही सभाओं में लाखों की भीड़ होती है और वे वाजपेयी की तरह सहज वक्ता नहीं हैं लेकिन भीड़ को बांध कर रखना उन्हें अच्छी तरह आता है। मुहावरे वे गढ़ लेते हैं, जहां जरूरत होती है, वहां वही भाषा बोलते हैं और अच्छे-अच्छे खलनायकों को हिट करने वाली और दर्शकों को मुग्ध करने वाली जो बात होती है, वह मोदी में भी है कि वे अपने किसी कर्म, अकर्म या कुकर्म पर शर्मिंदा नजर नहीं आते। नरेंद्र मोदी गोधरा के खलनायक हैं मगर संघ परिवार, भाजपा और कुल मिला कर हिंदुओं के बीच भले आदमी माने जाते हैं। लेकिन मोदी गोधरा कांड की काली छाया से अभी तक उबर नहीं पाए हैं।
पिछली चुनावी विफलताओं से भाजपा ने सबक सीखा है। सबक यह है कि अगले चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में किसी नेता को पेश नहीं किया जायेगा। प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के नाम की चर्चा तो बुद्धि विलास या फिर एक खास वर्ग में डर पैदा करने की अनावश्यक कोशिश के अलावा और कुछ भी नहीं लगती है। नरेंद्र मोदी व्यक्तिश: प्रधानमंत्री पद के योग्य हैं या नहीं, इस सवाल को छोड़ भी दिया जाए तो भी सवाल यह उठता ही है कि उन्हें प्रधानमंत्री आखिर बना कौन रहा है? क्या उनकी पार्टी में आज इस सवाल पर एकमत कौन कहे, सर्वानुमति भी है? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आरएसएस आखिर चाहता क्या है? यदि आरएसएस मोदी को प्रधानमंत्री पद पर देखना भी चाहे तो उसके लिए भाजपा को खुद अकेले अपने बल पर लोकसभा में बहुमत लाना होगा? आज के राजनीतिक माहौल को देखते हुए ऐसा बहुमत कहीं से संभव नहीं लगता है। यहां मान कर चला जा रहा है कि भाजपा के कतिपय सहयोगी दल नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखना नहीं चाहेंगे। फिर भी इस पद को लेकर मोदी के नाम की चर्चा क्यों इतनी अधिक हो रही है, आश्चर्य होता है।
आडवाणी और मोदी की वनिस्वत सुषमा व जेटली अलबत्ता कुछ साफ-सुथरे हैं, मगर उनकी ताकत कुछ खास नहीं। सुषमा स्वराज फिलहाल चुप हैं, क्योंकि वे जानती हैं कि अकेले भाजपा के दम पर तो सरकार बनेगी नहीं, और अन्य दलों का सहयोग लेना ही होगा। ऐसे में मोदी की तुलना में उनको पसंद किया जाएगा। रहा सवाल जेटली का तो वे भी गुटबाजी को आधार बना कर मौका पडऩे पर यकायक आगे आने का फिराक में हैं। इसी प्रकार जहां तक राजनाथ सिंह के नाम का सवाल है तो यह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर निर्भर करता है। यदि भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा तो निश्चितरूप से उनकी दावेदारी मजबूत होगी। आडवाणी के अतिरिक्त पूर्व पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी उत्तर प्रदेश में रथयात्रा के माध्यम से आगे निकलने की कोशिश कर रहे हैं। इन सबके अतिरिक्त सुनने में यह भी आ रहा है कि पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी भी गुपचुप तैयारी कर रहे हैं। वे लोकसभा चुनाव नागपुर से लडऩा चाहते हैं और मौका पडऩे पर खुलकर दावा पेश कर देंगे। हालांकि कुछ वरिष्ठ नेता अपने को इस दौर से बाहर रखे हुए हैं पर कुछ ने खुलकर अपनी दावेदारी पेश कर दी है इसमें झारखंड से सांसद और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा का भी नाम शामिल हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने कहा है कि पार्टी में उनके सहित कई नेता प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के योग्य हैं लेकिन लोकसभा चुनावों के करीब आने पर ही यह फैसला किया जाएगा कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार किसे बनाया जाए किसे नहीं। उन्होंने स्वयं को भी प्रधानमंत्री पद दावेदार बताते हुए कहा कि मेरी क्षमता पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। सिन्हा ने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी में से किसे प्रधानमंत्री बनाया जाएगा इस आशय की अटकलों और इन दोनों नेताओं के बीच मतभेद की रिपोर्टों को कम महत्व देने की कोशिश की। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह केवल मीडिया की देन है और भाजपा में कोई इस बारे में बात नहीं कर रहा है।
इन सबके इतर एक नेता जो दबे और सधे कदमों से प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर बढ़ रहा है वह हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान। शिवराज संघ और भाजपा दोनों की आंखों के नूर हैं। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व शिवराज को तराश कर उन्हें अगला अटल बिहारी बनाने में जुट गया है। केन्द्रीय नेतृत्व को यह बात भलीभांति मालूम है कि क्षेत्रीय नेताओं में शिवराज ही ऐसे नेता हैं जिन्होंने केन्द्र और राज्य में विभिन्न पदों पर लंबे समय तक काम किया है। शिवराज की अभी तक की सफल राजनीतिक यात्रा पर गौर करें तो हम पाते हैं कि उनमें एक कुशल राजनेता के सभी गुण हैं। शिवराज की इसी खूबी को भाजपा भुनाने की तैयारी कर रही है। संघ और भाजपा की मंशा भांपकर शिवराज सिंह चौहान ने भी यात्राओं के इस माहौल में बेटी बचाओ अभियान के तहत यात्राओं का दौर शुरू कर दिया है। शिवराज की कार्यप्रणाली को देखे तो हम पाते हैं की आम आदमी के दिल में पैठ बनाने की अदा उनसे अधिक किसी अन्य नेता में नहीं है। आम जनता की दुखती नस की पहचान उन्हें खूब है। संघ और भाजपा संगठन इस बात को भलीभांति जानता है और मौका मिला तो वह शिवराज की सेक्यूलर छवि को भुनाने का कोई अवसर नहीं छोड़ेगा। जानकारों की मानें तो यह सब दो साल बाद की राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रख किया जा रहा है। राष्ट्रीय फलक पर गौर करें तो भाजपा के पास ऐसे चेहरों की कमी दिखाई पड़ती है जो भीड़ खींचने का माद्दा रखते हों और जिनकी छवि भी अच्छी हो। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर की नीति पर चलने वाले शिवराज इस कसौटी पर फिट बैठते हैं। उन्हें चुनौती गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और हाल ही में पार्टी की सदस्य बनी उमा भारती से मिल सकती है। लेकिन दोनों हिंदूवादी चेहरे हैं जिनसे गठबंधन के इस दौर में कई सहयोगियों को दिक्कत हो सकती है,इसलिए शिवराज जैसे मध्यमार्गी नेता पार्टी के लिए फायदेमंद रह सकते हैं।
रामनामी ओढ़कर राजनीति के मैदान में उतरी भारतीय जनता पार्टी अपनी साम्प्रदायिक छवि से आजिज आ चुकी है इसलिए वह अब अपनी छवि बदलने में लगी हुई है लेकिन उसे दमदार सेक्युलर चेहरा नहीं मिल पा रहा है। भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी, मुरली मनोहर जोशी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, नरेन्द्र मोदी आदि जितने कद्दावर नेता हैं इन सबकी साम्प्रदायिक छवि है। जब भाजपा हिन्दू पार्टी थी। जब हिंदुओं को भाजपा ने आंदोलित किया था। तब दलित, फारवर्ड, जाट, किसान आदि सभी जातियों या वर्गों ने अपनी पहचान हिन्दू मानी थी। तब जब आडवाणी ने राम रथयात्रा की थी। उस रियलिटी को भाजपा लीडरशिप ने आज इस दलील से खारिज किया हुआ है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ा करती। आज का समाज, आज का नौजवान और आज का हिन्दू अयोध्या पुराण से आगे बढ़ चुका है। इसलिए जरूरत आज वाजपेयी बनने की है। पार्टियों को पटाने की है और 2014 के लिए एलांयस के जुगाड़ की है। ऐसे में गठबंधन की मजबूरियां सामने आती हैं तो पार्टी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे कर सकती है।
अगर एनडीए गठबंधन की बात करें तो बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार का नाम प्रधानमंत्री के लिए सामने आता है। जिस नितीश कुमार के बारे में इस पद को लेकर आये दिन अटकलबाजी होती रहती है, उस मुख्यमंत्री ने हाल में यह साफ-साफ कह दिया कि बिहार की सेवा ही देश की सबसे बड़ी सेवा है। मैं प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं हूं। मैं ऐसी चर्चा करने वालों से हाथ जोड़ कर कहता हूं कि मुझ पर रहम कीजिए और मुझे बिहार की सेवा करने दीजिए जिसके लिए जनता ने मुझे आदेश दिया है।
भाजपा नेताओं की प्रधानमंत्री पद की इस दौड़ के परिपे्रक्ष्य में अगर हम देखें तो आज देश का जो राजनीतिक माहौल है,उसमें मोटे राजनीतिक तौर पर इस देश के मतदाता तीन हिस्सों में बंटे हुए हैं। मुख्यत: तीन राजनीतिक शक्तियां हैं-कांग्रेस गठबंधन, राजग और अन्ना-स्वामी रामदेव टीमें। यदि अन्ना-राम देव टीम के साथ राजग का कोई ढीला ढाला चुनावी तालमेल हुआ तो उस समूह की सीधी टक्कर कांग्रेस यानी यूपीए होगी। मान लिया कि ऐसा हो गया और राजग-अन्ना टीम को लोकसभा में बहुमत मिल गया। तो फिर क्या होगा?
अगले चुनाव में यदि अन्ना खेमे को सफलता मिलती है तो अभी यह भी अनिश्चित है कि उस खेमे की ओर से कौन नेता प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनेगा। यह भी तय नहीं है कि अन्ना-रामदेव खेमों का राजग से किस तरह का और कितना तालमेल हो पायेगा। कांग्रेस की ओर से चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री या फिर अगले चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बात तय करने में सबसे कम समय लगने वाला है। उस दल में किसी आंतरिक या बाह्य विवाद की कोई संभावना/गुंजाइश ही नहीं है। क्योंकि पार्टी पर सोनिया गांधी की पूरी पकड़ अभी भी बरकरार है।
यह बात भी मार्के की है कि कांग्रेस को छोड़कर किसी भी दल ने इस पद के लिए अपने उम्मीदवार की घोषणा अब तक तो नहीं की है, यहां तक कि कोई संकेत भी नहीं है। हां, प्रणव मुखर्जी ने हालिया बयान में राहुल गांधी की ओर इशारा जरूर किया है। पर वह तो एक मानी हुई बात रही है। दरअसल आज भ्रष्टाचार ही इस देश का सबसे बड़ा मुद्दा है। यदि अगले चुनाव से पहले इस बीच देश के जनजीवन में इससे भी बड़ी अन्य कोई घटना नहीं हो जाए या कोई अन्य मुद्दा नहीं उछल जाए तो अगला लोकसभा चुनाव इसी भ्रष्टाचार के मुद्दे के इर्द-गिर्द ही लड़ा जायेगा। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के नायक अन्ना हजारे खुद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं ही नहीं। वे तो चुनाव भी नहीं लड़ेंगे। हां, किसी न किसी रूप में अगले चुनाव को वह प्रभावित जरूर करेंगे जिस तरह जेपी ने 1977 में किया था। लेकिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी में जिस तरह प्रधानमंत्री पद को पाने को लेकर घमासान मचा हुआ है वह देश की राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं है। अगला प्रधान मंत्री कौन बनेगा? इस सवाल का जवाब बिलकुल भविष्य के गर्भ में है। क्योंकि तब जरूरी नहीं कि भाजपा का ही कोई नेता प्रधानमंत्री बने।